रायपुर। मन में हौसला हो तो दिव्यांगता भी आड़े नहीं आती। यदि ठान लिया जाए तो असंभव लगने वाला कार्य भी पूरा हो जाता है। किसी भी दिव्यांग को अपने आप पर विश्वास रखना चाहिए और मुसीबतों से न घबराते हुए पूरी मेहनत, लगन से आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। एक न एक दिन सफलता अवश्य मिलेगी।

यह कहना है दोनों पैरों से दिव्यांग छत्तीसगढ़ के पर्वतारोही चित्रसेन साहू का। प्रदेशभर के दिव्यांगों से पर्वतारोही साहू ने अपील की है कि वे जीवन से निराश न हों। बार-बार असफलता मिले तो भी प्रयास जारी रखें। सफलता अवश्य कदम चूमेगी।

दोनों पैर न होने के बावजूद यूरोप महाद्वीप की 5,642 मीटर की सबसे ऊंची चोटी माउंट एलब्रुस की चढ़ाई करने वाले चित्रसेन से दिव्यांग दिवस पर नईदुनिया ने विशेष बातचीत की। पर्वतारोही ने बताया कि सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद नौकरी करते हुए उनका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत हो रहा था।

लगभग औठ साल पहले 2014 में ट्रेन दुर्घटना में उनके दोनों पैर कट गए। महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। बिस्तर पर पड़े-पड़े जीवन से निराश हो गया था। इसके बाद मन में ठान लिया कि दिव्यांग होने के बावजूद वे कुछ ऐसा करेंगे कि लोग उन्हें हमेशा याद रखें। कृत्रिम पैर लगने के बाद वे धीरे-धीरे चलने लगे, फिर दौड़ने का अभ्यास किया। इसके बाद पहाड़ों पर चढ़ने की कोशिश की।

आखिरकार हौसला रंग लाया और 23 अगस्त 2021 को मास्को के समयानुसार सुबह 10.54 और भारतीय समयानुसार दोपहर 1.24 बजे माउंट एलब्रुस पर भारतीय तिरंगा लहराया। यह ऐतिहासिक पल वे जीवनभर नहीं भूल पाएंगे। उन्होंने कहा- मेरी सभी दिव्यांग भाइयों से प्रार्थना है कि वे भी कुछ लक्ष्य हासिल करके अपने और अपने परिवार के साथ प्रदेश, देश का नाम रोशन करें। प्रत्येक दिव्यांग में अद्भुत क्षमता होती है, बस वे अपनी क्षमता को पहचानें।

मूल रूप से बालोद निवासी चित्रसेन पिछले कई सालों से राजधानी में निवासरत हैं और दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुके हैं। साहू बताते हैं कि उन्होंने कृत्रिम पैरों के सहारे अफ्रीका महाद्वीप के तंजानिया के माउंट किलिमंजारो और आस्ट्रेलिया महाद्वीक के माउंट कोजीअस्को की चढ़ाई करके नेशनल रिकार्ड बनाया था। अब उनका लक्ष्य सात महाद्वीपों की सभी ऊंची जगहों पर जाना है। वे राष्ट्रीय व्हीलचेयर बास्केटबाल एवं राष्ट्रीय पैरा स्वीमिंग के ब्लेड रनर खिलाड़ी हैं।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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