रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। छत्‍तीसगढ़ में 'लुमोस तेज' तकनीक से दोबारा उपयोग के लायक एन-95 मास्क बनाया जा सकता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के इंटर्न और चिकित्सकों की एक टीम ने यूवी बाक्स 'लुमोस तेज' का निर्माण किया है, जिसमें यूवी-रे की मदद से एन-95 मास्क को संक्रमण मुक्त किया जा सकेगा। चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद बनाए गए इस यूवी बाक्स में बड़ी संख्या में एन-95 मास्क को दोबारा प्रयोग के लायक बनाया जा सकता है।

  • एम्स रायपुर के इंटर्न और चिकित्सकों ने किया यूवी बाक्स का निर्माण
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर के जर्नल में भी प्रकाशित, राज्य सरकार से सहायता को आवेदन

एम्स के इस शोध को 'इंटरनेशनल जर्नल आफ साइंटिफिक रिसर्च' में भी प्रकाशित किया गया है। वर्ष 2020 में एम्स के इंटर्न डॉ. शशि शेखर दुबे की पोस्टिंग पल्मोनरी विभाग में थी। तभी कोविड-19 महामारी के बाद बड़ी संख्या में एन-95 मास्क प्रयोग करने के दौरान उनके मन में विचार आया कि इस प्रकार का एक बाक्स बनाया जा सकता है, जिसमें इन सभी संक्रमित या प्रयोग किए गए मास्क को कुछ देर रखकर संक्रमण खत्म किया जा सके। इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों को भी दूर किया जा सकता है।

कोविड रोगियों के उपचार की व्यस्तता के बाद भी उन्होंने कुछ तकनीशियन की मदद से पांच दिनों में चार फीट का एक यूवी बाक्स बनाया। इस दौरान उन्हें कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। प्रारंभ में लाकडाउन के चलते उन्हें अनुसंधान के लिए आवश्यक यूवी लाइट नहीं मिल रही थी। किसी प्रकार उन्होंने रायपुर में उपलब्ध यूवी लाइट खरीद कर एल्युमिनियम पैनल और अन्य मटेरियल की मदद से इस यूवी बाक्स का निर्माण किया, उन्होंने इसे लुमोस तेज का नाम दिया जो हैरी पार्टर की किताब पर आधारित है।

बाक्स के निर्माण के बाद उन्होंने इसमें संक्रमित मास्क को रखकर कोविड-19 प्रोटोकाल को ध्यान में रखते हुए स्वयं का अनुसंधान प्रारंभ किया। चार महीनों के सतत प्रयासों के बाद उन्हें इस प्रकार के मास्क को संक्रमण मुक्त करने में मदद मिली। इस दौरान उन्होंने एक निर्धारित प्रक्रिया भी चिन्हित की जिसका पालन करके आधे घंटे के अंदर बड़ी संख्या में एन-95 मास्क को संक्रमण मुक्त किया जा सकता है। इसकी पुष्टि एम्स की वीआरडी लैब ने भी की है।

इस सफलता पर एम्स के निदेशक प्रो. (डा.) नितिन एम. नागरकर ने बधाई दी है। डा. शशि शेखर ने इस सफलता का श्रेय डीन (रिसर्च) प्रो. सरिता अग्रवाल और डा. अतुल जिंदल के साथ वीआरडी लैब के अनुसंधानकर्ताओं को भी दिया है। प्रो. नागरकर ने कहा है कि इस प्रकार का अनुसंधान व्यावहारिक और वैज्ञानिक अनुसंधान के समन्वय को प्रदर्शित करता है। इस अनुसंधान से निश्चित रूप से चिकित्सा संस्थानों को काफी मदद मिलेगी। डा. शशि शेखर ने यह अनुसंधान वित्तीय सहायता के लिए छत्‍तीसगढ़ की काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलाजी को भी प्रेषित किया है।

Posted By: Kadir Khan

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