रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञानी, किसानों को न सिर्फ मधुमक्खी पालन करना सिखा रहे हैं, बल्कि उनके खेतों की मेड़ पर मधुमक्खी पालन करवाकर पर-परागण की प्रक्रिया से अधिक उत्पादन होने की जानकारी भी दे रहे हैं। यह प्रक्रिया प्रदेश के अंबिकापुर और जगदलपुर के कुछ गांवों में शुरू हो चुकी है। जिन जगहों में पर-परागण की प्रक्रिया न हो पाने से खेती कमजोर हो रही है, वहां मधुमक्खी पालन करके उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। देश में कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार किसानों के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है। इसी कड़ी में अंबिकापुर के राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय और अनुसंधान केंद्र में पिछले कई सालों से मधुमक्खी पालन पर काम किया जा रहा है। अखिल भारतीय समन्वित मधुमक्खी पालन एवं परागण सहायक कीट अनुसंधान परियोजना के तहत इस वर्ष केंद्र सरकार द्वारा मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए आत्मनिर्भर भारत के तहत 500 करोड़ रुपये देने का प्रावधान किया गया है। कृषि विवि के कुलपति डॉ. एके पाटिल के मुताबिक अनुसंधान केंद्रों से किसान मधुमक्खी पालन करना सीख सकते हैं। किसानों को अनुसंधान केंद्र से मधुमक्खी कीट भी दिए जा रहे हैं। खेतों की मेड़ पर मधुमक्खी बॉक्स के जरिए मधुमक्खी पालन करना सिखाया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जहां रोजगार का साधन प्राप्त होगा, वहीं पर-परागण के माध्यम से फसलों से होने वाली आय और गुणवत्ता में भी वृद्धि होगी। साथ ही मधुमक्खी पालन से शहद और मोम जैसे उत्पाद भी प्राप्त होंगे।

इसलिए मधुमक्खियां हमारे लिए उपयोगी

मधुमक्खी से हमें शहद मिलता है। उदाहरण के तौर पर आपने अपने जीवन में कभी न कभी शहद का स्वाद जरूर चखा होगा। अगर मधुमक्खी नहीं होती तो यह शहद भी नहीं होता। मधुमक्खी फूलों का रस चूस कर उसके द्वारा शहद का निर्माण करती है। अंबिकापुर अनुसंधान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीपी पैकरा का कहना है कि मधुमक्खियां जहां फसलों से पराग व हमारे लिए शहद एकत्रित करती हैं, वहीं पर-परागण की क्रिया संपन्ना करके फसलों की उपज बढ़ाती हैं, जिससे किसानों की आय बढ़ती है।

आर्थोपोडा संघ की हैं मधुमक्खियां

विश्व में मधुमक्खी की मुख्य पांच प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें चार प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। मधुमक्खी की इन प्रजातियों से हमारे यहां के लोग प्राचीन काल से परिचित रहे हैं। इसकी प्रमुख पांच प्रजातियां हैं। खैरा या भारतीय मौना प्रमुख है। इसे ग्रामीण क्षेत्रों में सतकोचवा मधुमक्खी कहते हैं, क्योंकि ये दीवारों या पेड़ों के खोखलों में एक के बाद एक करीब सात समानांतर छत्ते बनाती है। ये अन्य मधुमक्खियों की अपेक्षा कम आक्रामक होती है। इससे एक बार में एक-दो किलोग्राम शहद निकल सकता है। यह पेटियों में पाली जा सकती है। साल भर में इससे 10 से 15 किलोग्राम तक शहद प्राप्त हो सकता है।

हाथियों को भगाने में होंगी कारगर

कृषि विज्ञानियों का कहना है कि अगर किसान मधुमक्खियों को अपने खेतों की मेड़ पर पालते हैं तो इसके कई फायदे होंगे। पहला फायदा हाथी इन जगहों में नहीं आएंगे। वे मधुमक्खी की भिनभिनाहट सुनकर दूर भागते हैं। मधुमक्खी पुष्परस व पराग के साथ-साथ शुद्ध मधु, रायल जेली उत्पादन, मोम उत्पादन, पराग, मौनी विष आदि के लिए उपयोगी है।

Posted By: Nai Dunia News Network

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

ipl 2020
ipl 2020