दीपक अवस्थी, रायपुर नईदुनिया। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल के रिसर्च के आंकड़े बता रहे हैं कि मरीजों ने इतनी एंटीबायोटिक ले ली है कि अब फोर्थ जनरेशन की एंटीबायोटिक दवा भी बेअसर हो रही है। सर्वेक्षण में पता चला है कि दर्द होने पर फर्स्ट जनरेशन की दवाई लेने के बजाय फोर्थ जनरेशन की ले रहे हैं। इसी वजह से अब दवा असर नहीं कर रही है। प्रदेश में लगातार एंटीबायोटिक दवाओं की खपत बढ़ रही है, जो कहीं न कहीं असर न होने पर अत्यधिक सेवन की ओर इंगित कर रही है। रिसर्च के अनुसार मरीज हल्के-पुल्के दर्द में भी एंटीबायोटिक दवाई ले रहे हैं। इससे देश के 67 प्रतिशत मरीजों पर दवाई बेअसर हो रही है। दो प्रतिशत ऐसे मरीज हैं जिन पर पहली बार में ही दवाई असर करती है। वहीं 31 प्रतिशत ऐसे मरीज हैं जिन्हें सेकंड जनरेशन की दवाई ही असर करती है।

ये होता है जनरेशन विशेषज्ञों के अनुसार

फर्स्ट जनरेशन की दवा - किसी भी मरीज को सामान्य दर्द है तो उसे फर्स्ट जनरेशन की एंटीबायोटिक दवा दी जाती है। इसका मरीज के आंतरिक अंगों पर बहुत कम असर होता है।

सेकंड जनरेशन की दवा - किसी मरीज को हल्की चोट या दर्द है तो सेकंड जनरेशन की दवा दी जाती है। इसका कोर्स पूरा करना होता है।

थर्ड जनरेशन की दवा - सर्जरी और ऑपरेशन वाले मरीजों को थर्ड जनरेशन की दवा दी जाती है। साथ ही डॉक्टर उसकी समय सीमा तय करते हैं। उसके बाद मरीज को कभी भी डॉक्टर की सलाह के बगैर दवा नहीं खानी चाहिए।

फोर्थ जनरेशन की दवा - तात्कालिक राहत के लिए एक बार ही फोर्थ जनरेशन की दवा दी जाती है। बाद में थर्ड या सेकंड जनरेशन की दवा दी जाती है।

इन कारणों से दवा हो रही बेअसर

रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार मरीज बिना डॉक्टर्स की सलाह के एंटीबायोटिक दवा खा लेते हैं। वे यह नहीं पता करते कि एंटीबायोटिक कौन से जनरेशन की है। फर्स्ट जनरेशन की जगह अब फोर्थ जनरेशन की दवाई लेने के कारण उन पर एंटीबायोटिक असर करना बंद कर देती है।

आंकड़ा (सालभर का) में इतनी एंटीबायोटिक खा रहे प्रदेशवासी

-2018-19 में 12 हजार बाक्स

- 2017-18 में 10 हजार 900 बाक्स

- 2016-17 में 10 हजार 200 बाक्स

(एक बॉक्स में 100 टैबलेट)

राज्य सरकार ने बनाई है एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग कम करने के लिए कमेटी

विशेषज्ञों की कमेटी तैयार की गई है। छत्तीसगढ़ सरकार 'एंटी बायोटिक पॉलिसी फॉर ऑल हेल्थ केयर फैसिलिटी' लेकर आ रही है। इसमें एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग पर ड्राफ्ट तैयार किया गया है।

एंटीबायोटिक दवाइयों के प्रति देश सजग नहीं है। इसी तरह से इस्तेमाल होता रहा तो भविष्य में परिणाम बेहद घातक होंगे। बिना डॉक्टर के पर्ची के मेडिकल स्टोर से दर्द की दवा नहीं देनी चाहिए। ऐसा करने से ही भारतीय समाज का भविष्य सुरक्षित होगा। किसी भी मरीज को दर्द हो तो वह फर्स्ट जनरेशन की ही दवा ले। फोर्थ जनरेशन की दवा कभी न खाए। -डॉ. पल्लव रे, रिसर्च के लीड, पीजीआइ, चंडीगढ़

लगतार एंटीबायोटिक दवाइयों की खपत बढ़ती जा रही है, जो चिंतनीय है। प्रतिवर्ष एक हजार से लेकर पांच सौ बॉक्स तक खपत बढ़ रही है। -अश्वनी विग, सचिव, रायपुर ड्रगिस्ट एवं केमिस्ट एसोशिएसन

Posted By: Nai Dunia News Network