रायपुर। निजी स्कूलों में अगले महीने दिसंबर से दाखिले के लिए प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। वर्तमान सरकार ने स्कूलों में फीस तय करने के लिए आयोग बनाने का दावा किया था, लेकिन आयोग आज तक नहीं बन पाया। कांग्रेस की सरकार आते ही दावा किया गया था कि पालकों को राहत मिलेगी, लेकिन ज्यादातर बड़े स्कूल भी राजनीतिक लोगों से जुड़े होने के कारण सरकार फैसला लेने से पीछे हटती नजर आ रही है। नाममात्र के लिए फीस तय करने की जिम्मेदारी अभी की व्यवस्था में पालक समिति को है, लेकिन वहां उनकी दखलंदाजी न के बराबर है। सबसे बड़ी समस्या शहर में बिना मान्यता के चल रहे प्ले स्कूल हैं, जो कि कमाई के लिए ही स्कूल में तरह-तरह के प्रोग्राम तय करते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि शहर में कई प्ले स्कूल ऐसे हैं, जहां साल भर की फीस इंजीनियरिंग की फीस से ज्यादा है।

राजधानी समेत प्रदेश भर में कुछ स्कूलों की फीस को लेकर विवाद पुलिस और स्कूल शिक्षा विभाग तक भी पहुंचा। इसके बाद भी अफसर खामोश हैं। राजधानी के निजी स्कूलों में न्यूनतम 10 हजार रुपये से लेकर एक लाख 25 हजार रुपये तक नर्सरी और पहली कक्षा की फीस है, जबकि इंजीनियरिंग कॉलेजों में न्यूनतम 30 हजार से लेकर अधिकतम फीस 57 हजार से लेकर 65 हजार रुपये प्रति वर्ष है। प्रदेश के 12 हजार निजी स्कूलों में 15 लाख से अधिक विद्यार्थी निजी स्कूलों में अध्ययनरत हैं।

खेल और प्रतिस्पर्धा ऐसी, जहां होती है कमाई

खासकर निजी प्ले स्कूलों में फीस की मनमानी को रोकने के लिए कोई नियम नहीं होने से सिस्टम नहीं खड़ा हो पाया। आलम यह है कि स्कूल प्रबंधक अब फीस के साथ-साथ बस किराया के अलावा यूनिफॉर्म, बुक्स, स्टेशनरी, फूड, कम्प्यूटर क्लास, फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन पोशाक, समर वेकेशन, सेलिब्रिटी, गेम्स ट्रेनर, स्कूल बैच, फोटोग्राफी, पेंटिंग कॉम्पिटिशन, टूर, आनंद मेला और कूपन के नाम पर भी शुल्क एंठ रहे हैं। यहां खेल और प्रतियोगिताएं ऐसी होती है जिसके लिए पालकों से वसूली की जा सके।

अंग्रेजी के नाम पर ढकोसला

राजधानी में ज्यादातर प्ले स्कूलों में पालकों को अंग्रेजी का आकर्षण दिखाकर एंठा जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि ज्यादातर प्ले स्कूलों में मापदंड के अनुरूप शिक्षक तक नहीं हैं। अंग्रेजी पढ़ाने के नाम पर निजी स्कूलों में पालकों की मनमानी जेब काटी जा रही है। निजी स्कूलों में हर साल 15 फीसदी तक फीस बढ़ रही है और नियंत्रण कुछ नहीं है।

राजनीतिक मुद्दा फीस

प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही स्कूल की फीस को अपना राजनीतिक एजेंडा बना चुके हैं। इसका इस्तेमाल करके दोनों ही पार्टियां सत्ता में आ चुकी हैं। अभी वर्तमान में कांग्रेस और इसके पहले भाजपा सरकारा ने भी साल 2013 में सरकार बनाने से पहले दिए गए घोषणा पत्र में फीस नियामक आयोग बनाने की घोषणा की थी। दोनों ही सरकार का इस मामले में रवैया एक ही जैसा दिखा।

- फीस आयोग बनाने के लिए प्रक्रिया चल रही है। इस बार निजी स्कूलों को भी दायरे में लाने पर विचार किया जाएगा। - गौरव द्विवेदी, प्रमुख सचिव, स्कूल शिक्षा

Posted By: Nai Dunia News Network