रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

हर साल भगवान विष्णु चातुर्मास में चार महीने तक विश्राम करते हैं, इस साल एक माह पुरुषोत्तम मास के रूप में अतिरिक्त होने के कारण भगवान ने पांच माह तक विश्राम किया। बुधवार को देवउठनी एकादशी पर सुबह मंदिरों में पूजा-अर्चना करके भगवान को जगाने की परंपरा निभाई गई। रात्रि में भगवान का विवाह तुलसी से रचाया गया। सुबह राजधानी के दूधाधारी मठ, जैतूसाव मठ समेत अनेक राधा-कृष्ण मंदिरों में देवउठनी एकादशी पर भगवान को जगाया गया। शाम के बाद घर-घर में तुलसी-शालिग्राम के विवाह का उल्लास छाया रहा।

एक जुलाई को शुरू हुआ था भगवान का विश्राम काल

इस साल एक जुलाई को भगवान जगन्नाथ के मौसी के घर से लौटने वाले दिन देवशयनी एकादशी पर भगवान के विश्राम पर जाने की परंपरा निभाई गई थी। चार माह 25 दिन के अंतराल के बाद बुधवार को देवउठनी एकादशी पर भगवान जागे।

शुभ संस्कारों की शुरुआत

चातुर्मास में सभी शुभ संस्कारों पर रोक लगी थी। भगवान के जागने के साथ अब पुनः विवाह समेत सभी शुभ संस्कार किए जा सकेंगे।

तुलसी को बेटी मान रचाया ब्याह

जिनकी बेटियां नहीं हैं, उन परिवारों ने तुलसी पौधे को ही बेटी मानकर विधिवत पूजा करके भगवान विष्णु स्वरूप शालिग्राम से विवाह रचाकर कन्यादान की रस्म निभाई। जैतूसाव मठ, दूधाधारी मठ, शंकराचार्य आश्रम में भी तुलसी संग शालिग्राम के विवाह की परंपरा निभाई।

भगवान विष्णु और सती वृंदा की कथा

शंकराचार्य आश्रम के ब्रह्मचारी डा. इंदुभवानंद महाराज के अनुसार भगवान शंकर और जलंधर के बीच युद्ध हुआ। जलंधर की पत्नी वृंदा के सतीत्व के चलते भगवान शंकर भी जलंधर को परास्त नहीं कर सके। भगवान विष्णु ने छल-कपट से वृंदा के पति का रूप धारण किया और वृंदा के सतीत्व को भंग किया। सतीत्व भंग होते ही जलंधर परास्त हो गया। विष्णु के छल का जब वृंदा को पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दिया। देवताओं के अनुरोध करने पर वृंदा ने श्राप वापस लिया और वह जलंधर के साथ सती हो गई। वृंदा की राख से तुलसी का पौधा पनपा। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम (पत्थर) रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी मान्यता के चलते कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराने की परंपरा शुरू हुई।

मंडप सजाने के लिए खूब बिके गन्ने

पुरानी बस्ती, गोलबाजार, शास्त्री बाजार, आमापारा, लाखेनगर, सुंदरनगर, कालीबाड़ी, टिकरापारा आदि इलाकों में पूजन सामग्री खरीदने लोग उमड़ पड़े। मंडप सजाने के लिए गन्ने 30 से 70 रुपये जोड़ी में खूब बिके। चना भाजी 150-200 रुपए किलो तक बिकी। आंवला, अमरूद, सीताफल, बेर, सिंघाड़ा, कमल गट्टा, फूल, बताशा, शकरकंद आदि पूजन सामग्री खरीदने के लिए बाजार में भीड़ लगी रही।

देव-दीपावली पर सजी रंगोली, फूटे पटाखे

देवउठनी एकादशी को देव दीपावली के रूप में मनाया गया। मुख्य द्वार को रंगोली से सजाकर दीप प्रज्वलित किए गए। तुलसी पूजा के पश्चात पटाखे फोड़कर खुशियां मनाई गई।

Posted By: Nai Dunia News Network

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