रायपुर। छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सड़कों, रिंग रोड और गली-मोहल्लों में घूमने वाली गायों के गले में घंटी नहीं दिखती, बल्कि रेडियम का पट्टा नजर आता है। यह समझदारी गायों के मालिकों ने नहीं दिखाई है। यह पहल एक समाजसेवी संस्था ने की है। इससे रात के अंधेरे में सड़क केबीच बैठी गायों के गले में लटका पट्टा दूर से ही चमकता है। इसका फायदा यह हो रहा है कि गति में रहे वाहनों के चालक को पता चल जाता है कि सड़क पर गाय बैठी है। इससे चालक संभल जाता है।

यह प्रयास गाय की जान बचाने और दुर्घटना को रोकने में कारगर साबित हो रहा है। इस प्रयास पर एक सज्‍जन ने व्यंग्य किया कि उन युवाओं के गले में भी रेडियम का पट्टा पहनाना चाहिए, जो रात को तेज गति से बाइक लेकर फर्राटे भरते हैं। यदि उनके गले में ऐसा कोई पट्टा पहना दिया जाए जो गति नियंत्रित कर सके तो दुर्घटना न हो।

बच्चों की नहीं, स्वार्थ की चिंता

कोरोना संक्रमण के प्रसार को देखते हुए सरकार ने घोषणा की है कि आंगनबाड़ी के माध्यम से बच्चों को घर तक भोजन पहुंचाया जाए। इस आदेश का आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने विरोध करते हुए कहा कि घर-घर जाकर नहीं बांटेंगे। जब विभाग के अधिकारियों को पता चला तो सख्ती बरतते हुए कहा कि यदि घर-घर जाकर नहीं बांटा तो भविष्य में आंगनबाड़ी केंद्रों की सख्त जांच की जाएगी।

डर से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर बांटना शुरू किया। एक अधिकारी ने बताया कि कई आंगनबाड़ी केंद्र ऐसे हैं, जहां की महिला प्रमुख ने अपने घर केबच्चों तक का पंजीयन करवा रखा है, ताकि ज्यादा संख्या दिखाकर लाभ लिया जा सके। इसके अलावा वे अक्सर वेतन को लेकर सरकार केखिलाफ प्रदर्शन भी करते हैं। सरकार भी वोट बैंक के कारण सब देखकर चुप रहती है। सच्चाई यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बच्चों की चिंता नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ की चिंता रहती है।

मांगते रहो जानकारी नहीं देंगे

राज्य में कला-संस्कृति को बढ़ावा देने का जिम्मा उठाने वाला विभाग कार्यक्रमों को करने केलिए लाखों रुपये खर्च करता है। राजदार बताते हैं कि एक रुपया खर्च हो तो कई गुना ज्यादा दर्शाया जाता है। इसकी जानकारी लेने केलिए जब कुछ जागरूक लोगों ने विभाग में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो अधिकारियों ने जवाब देना उचित नहीं समझा। एक जागरूक ने बताया कि वे साल भर से आवेदन दे रहे हैं, लेकिन विभाग ने अब तक एक भी विषय पर जवाब नहीं दिया है।

लोग विभाग के अधिकारियों की मनमानी से त्रस्त हैं। कलाकारों का कहना है कि विभाग के अधिकारी सिर्फ अपने चहेतों को ही वहां काम देते हैं। वे नहीं चाहते कि दूसरों को उनकेगोलमाल की जानकारी किसी को मिले। अगर अधिकारी ईमानदार हैं तो उन्हें जानकारी देने में आनाकानी क्यों करनी पड़ रही है। वे तुरंत जानकारी देते तो उन पर अंगुली क्यों उठती?

बिना देखे परखे इलाज

निजी अस्पताल में कोई मरीज जाए तो उसकी तमाम जांच की जाती है। यहां डाक्टर मरीज की नहीं सुनते। इसके विपरीत नौकरी पेशा वर्ग केलिए बना ईएसआइ अस्पताल के डाक्टर मरीजों की बिना जांच किए ही दवाई लिखकर दे देते हैं। वहां डाक्टर अपने केबिन में भी मरीजों को आने तक की अनुमति नहीं देते हैं। डाक्टर 10 फीट दूर से ही मरीज को बताता है कि उसे फलां बीमारी है।

डाक्टर न नाड़ी देखते हैं न आंखें। बस दवा दे दी जाती है। नर्स और कंपाउंडर भी बीपी तक जांचते। एक मरीज ने विरोध किया तो डाक्टर बरस पड़े कि पास बुलाकर हमें मरना है क्या? तुम्हें दवा से मतलब है, चुपचाप लो और जाओ। बेचारा मरीज बाहर निकलकर कोसने लगा कि सरकार ने कैसे लोगों को नियुक्त कर रखा है। जब जांच नहीं करना है तो दवा का क्या लाभ है। अब मरीजों का भगवान ही मालिक है।

Posted By: Kadir Khan

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