रायपुर। अक्सर युवा जोड़ों को एक-दूसरे से शिकायत होती है कि उनके विचार नहीं मिलते। लड़-झगड़कर वे अलग हो जाते हैं। बाद में अफसोस होता है कि काश, वे थोड़ा समझौता कर लेते तो जीवन अकेले नहीं गुजारना पड़ता। ऐसा ही अफसोस विधुर, विधवा, तलाकशुदा सम्मेलन में कुछ लोगों ने खुलकर किया। 70-75 साल के बुजुर्ग लड़खड़ाते कदमों से परिचय देने मंच पर पहुंचे।

एक बुजुर्ग तो मंच पर चढ़ भी नहीं पा रहे थे। उन बुजुर्ग की बात सुनकर लोग भावुक हो गए। बुजुर्ग का कहना था कि उनका भरा पूरा परिवार है, फिर भी पत्नी न होने से वे अकेले पड़ गए हैं। पत्नी जब जीवित थी, तब उसका महत्व समझ में नहीं आया। उसकी मौत के बाद अब लग रहा है कि जीतेजी हम पत्नी को महत्व नहीं देते। यह सबसे बड़ी गलती है। पत्नी से ही जीवन में रौनक होती है। इससे सीख लेने की जरूरत है।

नंगे पांवों को मिले जूते-चप्पल

कहावत है कि जाके पांव न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई। जिनके पैर में कभी छाले नहीं पड़े, वे भला दूसरों का दर्द क्या समझेंगे? इसके विपरीत कुछ ऐसे दानदाता शहर में हैं , जिन्हें दूसरों की चिंता रहती है। ऐसे ही समाजसेवियों ने जब धूप में नंगे पैर घूम रहे बच्चों और निर्धनों को जूते-चप्पल पहनाए तो उनके चेहरों पर खुशी छा गई। एक बच्चे ने कहा कि भगवान आपका भला करे, मैंने आज तक नया जूता नहीं पहना था। किसी की फेंकी हुई फटी चप्पल ही पहनते थे। आज नया जूता पहनने का मौका मिला है।

बच्चे की बात सुनकर समाजसेवी की आंखें भर आईं और संकल्प लिया कि जहां भी बच्चे नंगे पैर दिखेंगे, वे नए जूते-चप्पल अवश्य दिलाएंगे। इनसे प्रेरणा लेकर कई लोग आगे आए और जूता, चप्पल देना शुरू किया। इस दान की प्रशंसा करते लोग कह रहे हैं, असली दान यही है।

सद्भावना की मिसाल

गंगा-जमुनी तहजीब और विविध धर्मों के लोगों के बीच सद्भावना की मिसाल देखकर गत दिनों लोग खुश हो गए। कहने लगे कि यही भगवान की सच्ची भक्ति है। हमारा धर्म हमें हिल-मिलकर रहना सिखाता है, किसी से बैर करना नहीं। दरअसल एक सामाजिक संगठन के सदस्यों ने मस्जिद से निकल रहे लोगों को मिठाई, फल, मेवा बांटकर ईद की मुबारकबाद देते हुए सद्भावना की मिसाल पेश की।

बिना अहंकार और दिखावा किए सामान बांटा भी जा रहा था और बिना संकोच किए लोग उसे ग्रहण भी कर रहे थे। सबकी नीयत साफ थी, कोई छल-कपट की भावना नहीं थी। इस संदेश ने दोनों धर्मों के लोगों को करीब लाकर खड़ा कर दिया। गले मिले, मुबारकबाद दी और मन के भीतर की शंकाओं को मिटा दिया। लोग कहने लगे कि हर साल दोनों धमर्ों के पर्व, त्योहार साथ आएं तो किसी तरह की धार्मिक दूरियां नहीं रहेंगी। चारों ओर खुशियां हांेगी।

दो साल गम के बाद मिली खुशी

कोरोना काल में दो साल तक घर में न मेहमान आए, न बरात निकली और न ही भव्य पार्टी हुई। इन दो सालों की कसर एक ही दिन में पूरी हो गई। अक्षय तृतीया पर बाजे-गाजे के साथ बरात भी निकली और सैकड़ों मेहमानों ने दावत का आनंद लिया। इसी दिन भगवान परशुराम की शोभायात्रा की भी धूम रही और हजारों लोगों ने एक साथ नमाज भी पढ़ी।

महामारी की दहशत में नियमों के चलते दो साल तक मात्र पांच लोग ही नमाज में शामिल हुए थे और शादी में भी पांच दस ने ही खुशियां मनाई थीं। इस बार जब एक साथ सैकड़ों लोग मिले तो एक ही बात पर चर्चा हुई कि हे भगवान, हे खुदा, दोबारा वैसे दिन किसी को न दिखाना कि लोग एक-दूसरे से दूरी बनाएं, बल्कि आपस में गले मिलें, हंसी-खुशी से हर त्योहार मनाएं, साथ में रहें। इसी में जीवन का आनंद है।

Posted By: Kadir Khan

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