रायपुर। "कका" यानी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की किसानी इन दिनों चर्चा का विषय बनी है। पिछले दिनों उन्होंने एक खेत में हल चलाकर यह संदेश दिया कि वह सत्ता में होने के बावजूद खेत-मेड़ को नहीं भूले हैं और किसानों की खुशहाली के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। गांव खुश तो प्रदेश खुश। उन्हें भेंट-मुलाकात कार्यक्रम में भरपूर जनसमर्थन मिल रहा है।

गांव की चौपालों और शहरी राजनीतिक गलियारों में वह चर्चा के केंद्र में रहते हैं। लोगों का कहना है कि अगले साल विधानसभा का चुनाव है। कका की भेंट-मुलाकात रंग दिखा सकती है। विपक्षी राजनीतिक पार्टियां चिंता में हैं कि वे कौन-सा जादू चलाकर राज्य में अपना जनसमर्थन बढ़ाएं? क्या सिर्फ कांग्रेस की आलोचना करके विपक्ष अगला चुनाव साध सकता है? यह भी विचारणीय है। किसी के पास ढंग के मुद्दे भी नहीं हैं। लोगों का आकलन है कि अगले चुनाव में भी कका बाजी मार सकते हैं।

बचकर रहना रे बाबा!

एक सज्जन को यह भ्रम था कि उन्हें शहर में कोई नहीं जानता। इसको लेकर वह दुखी भी थे। न कोई दुआ-सलाम करता और न ही कोई कुशलक्षेम पूछता। लेकिन एक दिन उनका भ्रम टूट गया। वह रात के नौ बजे आफिस से घर लौट रहे थे। चौराहे पर चार-छह बदमाश लड़के खड़े थे। सज्जन नजरें झुकाकर उधर से गुजरे तो पीछे से उनके कान में यह आवाज पड़ी, 'अरे छोड़ो, जाने दो इसे।

इसके पास क्या मिलेगा? डिब्बे में चार रोटी और सब्जी लेकर आफिस जाता है। अब डिब्बा भी खाली होगा। साइकिल में हवा भराने के लिए दो-चार रुपये जेब में रखता है।" सज्जन चकित रह गए। उन्होंने साइकिल की गति बढ़ा दी। घर पहुंचने के बाद जब सामान्य हुए तो सोचने लगे, 'कोई जाने चाहे नहीं, लेकिन अपराधियों की सब पर नजर होती है। वे आने-जाने वालों की कुंडली अपने पास रखते हैं। बचकर रहना रे बाबा!"

कैमरे के सामने समाजसेवा

एक समाजसेवी कचरा उठाने के लिए प्रसिद्ध हैं। एक दिन उन्हें देखकर दुकान में खड़े दो लोग उनकी चर्चा करने लगे। एक ने कहा, 'चाचा के घर की ओर जाने वाली सड़क पर खूब कचरा पड़ा है, लेकिन वह उसे नहीं उठाते।" दूसरा हंसकर बोला, 'क्यों उठाएं? अभी उन्हें क्या मिलेगा? मीडिया वालों को बुला दो, फिर देखो चाचा की उत्साहपूर्ण समाजसेवा। दनादन कचरा साफ करने लगेंगे। दिखावे का जमाना है, भाई। बहुत कम ऐसे लोग हैं, जो बिना दिखावा किए सेवा-कार्य में जुटे रहते हैं।

सच्चे अर्थों में वही सच्ची सेवा है। सच्चे सेवाभावी लोग भी बहुत हैं, लेकिन उन्हें विरले लोग ही जानते हैं। सेवा के नाम पर मेवा खाने वाले लोग छाए हुए हैं। उन्हीं को सम्मान और पुरस्कार मिल रहे हैं। समाज में उनकी इज्जत है।" यह सुनकर दुकानदार हंसा। काम की व्यस्तता के कारण उसकी हंसी गायब थी। हंसी से खुद को हल्का महसूस किया।

तनाव छूमंतर

पिताजी बच्चों को सुख-सुविधा देकर उनका जीवन संवारने में जुटे थे। बच्चों की चिंता में उन्होंने अपने शौक और मित्रों से दूरी बना ली थी। बच्चों को ज्ञान देते रहते थे, लेकिन उनकी टोकाटाकी संतानों को नागवार लगती थी। वह छुट्टी के दिन परिवार के बीच गुजारना चाहते थे, लेकिन स्वजन उनसे छरकते थे। एक दिन बेटी ने कहा, 'कल पिताजी की छुट्टी है। बाबा, मैं तो मौसी के घर चली जाऊंगी।" बेटा बोला, 'मैं लाइब्रेरी चला जाऊंगा।" पत्नी ने कहा, 'मैं मंदिर में ढोलक बजाने चली जाऊंगी।"

यह बात घर के मुखिया ने सुन ली, लेकिन कहा कुछ नहीं। उनके ज्ञान-चक्षु खुल गए। तब से छुट्टी के दिन वह गार्डन में जाकर मित्रों के पास बैठने लगे, ठहाके लगाने लगे, इसके अलावा गोष्ठियों और सम्मेलनों में जाने लगे। अब वह बहुत खुश हैं। घरवालों को भी अब उनसे कोई शिकायत नहीं है। छुट्टी का तनाव छूमंतर हो गया है।

Posted By: Pramod Sahu

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