रायपुर। पिछले दिनों प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने रायपुर शहर की कई सड़कें खोदकर बांस-बल्ली लगाई। ये गड्ढे कैसे और कब भरे जाएंगे? अगले माह मानसून आ जाएगा। सड़कों पर जब पानी भरेगा, तब ये गड्ढे राहगीरों के हाथ-पैर तोड़ेंगे। भरसक कोशिश की जाए कि सड़क खोदने की नौबत न आए। अगर कहीं जरूरी ही हो जाए तो गड्ढों को पाट दिया जाए।

लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों में इतनी संवेदना कहां कि वे राहगीरों के हाथ-पैर की सलामती के बारे में सोचें। आजकल तो लोग बस अपना काम निकालते हैं। उनकी गैरजिम्मेदारी के कारण कई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। अपनी आवश्यकता और सुविधा के साथ जनसुविधा का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। बरसात के पहले तमाम कंडम सड़कें दुरुस्त करा ली जाएं, यह लोगों की बत्तीसी और हाथ-पैर पर बड़ी कृपा होगी। गड्ढों में गिरकर कोई घायल न हो, इस पर गंभीरतापूर्वक कार्य हो। इस जिम्मेदारी का निर्वहन करें।

ये बड़े भिखारी!

दहेज की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। कमजोर आर्थिक स्थिति के लोगों को इससे बड़ी परेशानी होती है। कुछ समाज में जागरूकता आई है। उनमें बिना दहेज विवाह होने लगे हैं, लेकिन कई समाज दहेज की बुराई से मुक्त नहीं हुए हैं। लड़के वाले भिखारी की तरह दहेज मांगते हैं। लड़की वाले अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करके दहेज देते हैं, लेकिन लालची लड़के वाले संतुष्ट नहीं होते।

वे कम दहेज की बात कहकर बहू को अपमानित करते हैं। लड़की वालों को हमेशा नीचा दिखाते हैं। बहुत-सी बहुएं दहेज की भेंट चढ़ चुकी हैं। कई बहुओं की हत्या कर दी जाती है और कई प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर लेती हैं। कई लड़के पहले प्यार का नाटक करते हैं और जब शादी हो जाती है तो पत्नी पर दबाव बनाते हैं कि वह मायके से पैसे लाए। पता नहीं कि दहेज का कब अंत होगा?

सख्ती के बिना बढ़ रहा अपराध

पुलिस पर अपराध भारी पड़ रहा है। अपराधियों में डंडे का भय नहीं है। उनका भूत उतारने के लिए सख्ती जरूरी है। थानों में कड़ाई हो तो उनमें सुधार हो सकता है। सख्ती न होने की वजह से अपराधी छूटने के बाद पुन: अपराध करते हैं। पुराने जमाने में लोग पुलिस के नाम से ही कांपने लगते थे। एक बार जो अपराधी पुलिस का डंडा खा लेता था, वह दोबारा अपराध नहीं करता था।

किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वह अपराधी को छोड़ने के लिए पुलिस पर दबाव बनाए। आजकल तो अपराधी पाले जाने लगे हैं। कोई गुंडा-बदमाश पकड़ा जाता है तो उसे छोड़ने के लिए पुलिस पर दबाव बनाया जाता है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी तो पकड़े ही नहीं जाते। आज अपराधियों का इतना दुस्साहस बढ़ गया है कि वे पुलिस वालों पर भी हाथ उठाने लगे हैं। गहन चिंतन का विषय है कि अपराध कैसे रुके?

बिन गृहिणी घर भूत का डेरा

ठीक ही कहा गया है- 'बिन गृहिणी घर भूत का डेरा।" इस विषय पर दो अधिकारी गहन चिंतन कर रहे थे। दोनों की पत्नियां मायके गई हुई हैं। ऐसे में उन दोनों पर गृहस्थी का भार है। अब उन्हें समझ में आ रहा है कि घर में गृहिणियां कितना काम करती हैं। अधिकतर पुरुष उनके कार्य का संवेदनापूर्वक मूल्यांकन नहीं करते। कुछ लोग जरूर गृहिणियों के कामकाज में हाथ बंटाते हैं।

इससे उन पर जब जिम्मेदारी आती है, तब वे परेशान नहीं होते। ये दोनों चिंतक खाना बनाते हैं तो पसीना-पसीना हो जाते हैं। घर की साफ-सफाई भी इनसे नहीं हो पाती। इनका घर वाकई भूत का डेरा हो गया है। एक पीड़ित ने ज्ञान बघारा, 'नारी इतना त्याग करती है, तभी धर्मग्रंथों में उसके सम्मान की बात कही गई है।" दूसरे ने कहा, 'सच कह रहे हो। पत्नी के काम का सम्मान करना चाहिए।" काश, ये लोग सुधर जाते।

Posted By: Ravindra Thengdi

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