रायपुर। राजधानी में क्रिकेट मैच देखने का जुनून सिर चढ़ा हुआ है। युवा तो छोड़िए, बच्चे और बुजुर्ग भी दर्शकों में शामिल हैं। दो तीन किलोमीटर दूर पार्किंग में बाइक, कार रखकर पैदल स्टेडियम तक पहुंच रहे हैं। थके तो थोड़ा रुके, फिर चले। उन्हें दुख तो तब हुआ जब पुलिस वालों को ही नियमों की धज्जियां उड़ते देखा। उनका कोई परिचित होता तो उसे जाने देते।

कोई किसी अधिकारी से फोन करवाता तो उसे भी जाने दे रहे थे। पार्किंग पास न होने पर भी बहुत से लोग स्टेडियम के सामने तक वाहन ले गए। अपनी आंखों के सामने यह होता देखकर बहुत से क्रिकेट प्रेमी नाराज हुए। एक ने कहा- नियम उनके लिए हैं जो मजबूर हैं, जिनकी ऊंची पहुंच है या नाते रिश्तेदारी है उन्हें भला नियमों से क्या लेना देना है। नियम तोड़ने का काम वैसे ही लोग करते हैं, जो नियम बनाने में शामिल होते हैं।

जनता खुश न कलाकार

कुछ समय पहले तक मुक्त्ााकाशी मंच अथवा संस्कृति सभागार में कोई आयोजन होता था तो जबरदस्त क्रेज होता था। दर्शकों को बाहर खड़े होकर कार्यक्रम देखने के लिए मजबूर होना पड़ता था। अब कोई कार्यक्रम हो तो कलाकार या वक्तागण दर्शकों की बाट जोहते हैं। दर्शक नजर ही नहीं आते। इसे लेकर इन दिनों कलाकार, वक्ता निराश हैं। वे इसके लिए विभाग के अधिकारी, कर्मियों को जिम्मेदार ठहराते हैं।

उनका कहना है कि किसी भी कार्यक्रम का प्रचार प्रसार नहीं किया जाता। रात के कार्यक्रम की जानकारी सुबह दी जाती है। चाहते हुए भी दर्शक नहीं पहुंच पाते। पिछले दिनों सभागार में एक आयोजन था। विभाग ने आनन फानन में उसी दिन उसी वक्त पर मुंबई के एक नामी गायक कलाकार का रुबरु कार्यक्रम आयोजित कर दिया। चंद लोग ही पहुंचे। दोनों कार्यक्रम फेल हो गए। कलाकार को भी दुख हुआ और दूसरे कार्यक्रम के वक्ता गण भी नाराज हुए।

मैदान एक, रावण दो, सब कुछ

सालों पहले दशहरा पर्व पर रावण दहन मिलजुलकर किया जाता था। एक ही मैदान में सभी नेता, समाजसेवी बुराई के खिलाफ लड़ने और अच्छाई की जीत का संदेश देते थे। अब रावण दहन पर राजनीतिक रंग चढ़ गया है। ये तेरा रावण, ये मेरा रावण की भावना पैठ कर चुकी है। पिछले साल से एक ही मैदान पर दो-दो रावण जलाने की परंपरा शुरू हो चुकी है।

इस साल भी कांग्रेस का रावण और भाजपा का रावण एक मैदान पर थोड़ी थोड़ी दूर पर जलाया जाएगा। ज्यादातर आम लोग इस बात को लेकर दुखी हैं, वहीं कुछ खुश भी हैं कि जल्दी पहुंचेंगे तो दो रावण जलते देखेंगे और देरी से भी पहुंचने पर दूसरा रावण दहन तो देखने को मिल ही जाएगा। रामलीला के कलाकार खुश हैं कि किसी भी लीला पार्टी को नुकसान नहीं होगा। एक कार्यक्रम में एक की कमाई होती। दूसरे को कहीं और जाना पड़ता।


बिना पैसे के डोंगरगढ़ दर्शन

नवरात्र में देवी मंदिरों के दर्शन करने की चाह हर किसी के मन में होती है। कोई पैदल जाता है कोई हजारों खर्च करके पहुंचता है। कुछ ऐसे भी हैं जो परिवार के साथ जाना चाहते हैं, लेकिन धनाभाव के चलते इच्छा मन में ही दबी रह जाती है। खासकर ऐसे लोगों को दर्शन कराने का जिम्मा एक समिति ने उठाया है। जब निश्शुल्क डोंगरगढ़ यात्रा की जानकारी लोगों को हुई तो वे लोग भी तैयार हो गए जो सक्षम हैं किंतु अकेले नहीं जाना चाहते।

समिति की शर्त थी कि परिवार के लोगों को ही अनुमति होगी। सो, कुछ ने जुगाड़ लगाया और अपने परिचितों को अपना रिश्तेदार बताकर दर्शन कर आए। सेवा करने वाली संस्था ने भी यह सोचकर कि क्या फर्क पड़ता है, हमारा उद्देश्य तो दर्शन कराना है, कुछ नहीं कहा। अब पड़ताल कर ले जा रहे हैं कि यात्रा में कोई फर्जी न घुस जाए।

Posted By: Pramod Sahu

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close