रायपुर। जब सत्तापक्ष और विपक्ष के लोग एक ही कार्यक्रम में होते हैं तो केवल राजनीतिक बातें होती हंै। श्रेय लेने की होड़-सी मचती है, लेकिन पिछले दिनों टाउन हाल में जब जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज को आदरांजलि देने कार्यक्रम हुआ तो नेताओं में कोई मतभेद नहीं दिखाई दिया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हों या पूर्व भाजपा शासन काल के मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल हों या अन्य सत्तापक्ष और विपक्ष के नेता हों।

सभी ने जगद्गुरु शंकराचार्य के दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेकर सच्ची श्रद्धांजलि देने पर जोर दिया। कार्यक्रम में पहली बार ऐसा नजारा दिखा कि सभी दुखी थे, क्योंकि देश ने एक महान गुरु को खो दिया, जिनकी जगह कोई नहीं ले सकता। छत्तीसगढ़ से उनका गहरा लगाव था। वे अक्सर आते थे, धर्म की अलख जगाते थे। नेता किसी भी पार्टी के हों, उनसे आशीर्वाद लेते थे। अब श्रद्धालुओं को उनकी कमी खलेगी।

भड़की ज्वाला

कोई भी व्यक्ति अपना, अपनों का और अपने इष्टदेव का अपमान बर्दाश्त नहीं करता। जो अपमान करे उसे उसके कर्मों का फल मिलता अवश्य है। इन दिनों कायस्थ समाज के इष्टदेव को एक फिल्म में गलत ढंग से चित्रित किए जाने का जमकर विरोध चल रहा है, विरोध होना भी चाहिए। यदि विरोध न हो तो फिल्म बनाने वाले अति पर उतर आते हैं।

एक पुतला दहन कार्यक्रम में आक्रोशित व्यक्ति ने कहा कि वेब सीरीजों में गालियों वाले डायलाग खुलकर दिखाए जा रहे, सेंसर बोर्ड पता नहीं कैसे पास कर रहा है। यदि इष्टदेव के अपमान का विरोध नहीं किया तो पता नहीं भावी पीढ़ी किस तरह के दृश्य देखेगी। निर्माता, निर्देशकों, कलाकारों का विरोध करना जरूरी है, अपनी संस्कृति को तार-तार होते नहीं देख सकते। सभी धर्म को विरोध करने आगे आना चाहिए, वरना भविष्य में दूसरे समाज के इष्टदेवों का भी अपमान होगा, तब हम क्या करेंगे।

जब जमीन से जुड़ी हीरोइन

बड़े स्टार आम तौर पर आम जगहों में नहीं जा पाते, उनका स्टारडम आगे आ जाता है। ऐसे में यदि कोई जानी-मानी अभिनेत्री पब्लिक प्लेस पर हाथ में सैंडिल लेकर चलने लगे तो यह कौतूहल का विषय बन जाता है। बोल्ड अंदाज और तीखे बोल के लिए मशहूर अभिनेत्री स्वरा भास्कर जब रायपुर आईं तो पंडरी हाट-बाजार में कुम्हारों का चाक चलाया, घूमकर थक गर्इं तो हाथ में सैंडिल लेकर चलीं।

एक ने कहा कि साथ में कोई था नहीं, इसलिए यह करना पड़ा। उनके साथ तो बड़े बड़े अधिकारी चल रहे थे, भला वे क्यों सैंडिल उठाते? दूसरे ने कहा, वह जमीन से जुड़ी महिला हंै, हीरोइन होते हुए भी नाज नखरे नहीं है, वरना सफलता मिलते ही हीरोइन आसमान में उड़ने लगती है। खैर, लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही कि आखिर प्रशासन ने स्कूलों का दौरा करवाने के लिए बालीवुड की हीरोइन को क्यों बुलवाया?

मंच पर महिलाओं का जलवा

जो महिलाएं घर-गृहस्थी में रमकर परिवार की देखभाल करने में सारी उम्र खपा देती हैं, उनमें उत्साह जगाकर जब मंच पर अवसर दिया गया तो वे खुशी से झूम उठीं। ऐसी महिलाओं ने मुमताज, रीना राय, वहीदा रहमान, आशा पारेख, हेमा मालिनी की तरह ड्रेस पहनकर अपनी प्रतिभा को बाहर निकाला। उनके बच्चों ने उनका हौसला बढ़ाया, सामाजिक सदस्यों ने तालियां बजार्इं। यह देखकर महिलाओं में जोश जागा और वे भावुक होकर रो पड़ीं।

एक ने कहा- हम महिलाओं का जीवन चूल्हे-चौके में ही गुजर जाता है, खुशियां आकर करीब से गुजर जाती हैं। पारिवारिक जिम्मेदारी इतनी होती है कि उन्हें अपने शौक पूरे करने का वक्त नहीं मिलता। यदि थोड़ा वक्त और परिवार-समाज का सहयोग मिले तो हर घर से महिलाएं अपनी प्रतिभा दिखाने केलिए सामने आ सकती हैं। भला हो महाराष्ट्र मंडल का, जिसने आम महिलाओं को मंच प्रदान कर प्रतिभा दिखाने का सुनहरा अवसर प्रदान कर दिया।

Posted By: Pramod Sahu

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