रायपुर। न जाने कितने ऋषि-मुनि प्राचीन योग का फायदा बताते रहे, लेकिन कम ही लोगों ने इसे जीवनशैली का हिस्सा बनाया। जिन्होंने योग का महत्व समझा, उनमें ज्यादातर उम्रदराज लोग थे। युवाओं के पास योग करने के लिए समय ही कहां है? वे तो बस सिक्स पैक बाडी बनाने में रुचि लेते हैं। पिछले दिनों योग का भव्य आयोजन हुआ। एक साथ हजारों लोगों ने योग किया। उनमें से कुछ युवक-युवतियों का ध्यान योग में कम, योग की मुद्रा में ज्यादा से ज्यादा फोटो खिंचाना था।

पहले उनका साथी योग करते फोटो खिंचवाता, इसके बाद दूसरा भी वही क्रम दोहराता। आधे घंटे तक फोटो ही खिंचवाते रहे। यह देखकर एक बुजुर्ग से रहा नहीं गया। उसने कहा, जितनी फोटो खिंचवानी हो खिंचवा लो, लेकिन कहीं और जाओ, हमें डिस्टर्ब मत करो, ध्यान लगाने दो। यह सुनकर युवक झेंप गए और चुपचाप दूसरों की देखादेखी योग के आसन करने में जुट गए।

मैं भी राहुल, मुझे पकड़ो

पिछले दिनों एक प्रदर्शन में राहुल ही राहुल दिखाई दिए। दस-बीस नहीं, बल्कि सैकड़ों की संख्या में राहुल सड़क पर उतरे और कहा, मैं भी राहुल हूं, गिरफ्तार करो मुझे। किसी भी युवक का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, सभी ने मुखौटा पहन रखा था। दरअसल दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी से पूछताछ के विरोध में रायपुर में युवा प्रदर्शन कर रहे थे।

एक साथ जब सैकड़ों युवा राहुल गांधी का रूप धरकर निकले तो राहगीरों के बीच कौतूहल का विषय बन गए। एक बुजुर्ग को आश्चर्य हुआ और उसने एक युवक से पूछ लिया, बेटा, तुमने ये मुखौटा क्यों पहन रखा है? युवक को ठोस जानकारी नहीं थी, सो झेंप गया। बस इतना ही कहा, हमारे नेताजी ने प्रदर्शन में शामिल होकर मुखौटा लगाने को कहा, इसलिए मैंने लगाया है। असली कारण क्या है, वही बता सकते हैं। मुझे तो आदेश का पालन करना है।

बच्चों को मोबाइल ने नहीं, नशे ने बिगाड़ा

कोरोना काल में बच्चों को घर बैठे मोबाइल से पढ़ाया गया। मस्ती कर रहे बच्चों को चुप कराने के लिए माता-पिता ने हाथ में मोबाइल पकड़ा दिया। बच्चे गेम खेलकर, हिंसा भरी फिल्में देखकर समय काटते रहे। यही कारण है कि वे बिगड़ रहे हैं। उन्हें नशे से दूर रखने, हिंसात्मक रवैए से बचाने के लिए मोबाइल से दूर रखें। जब प्रदेश के मुखिया ने बच्चों को नशे से बचाने के लिए आयोजित कार्यक्रम में माता-पिता को सीख दी, तब एक अभिभावक ने दबी जुबान कहा, बच्चे मोबाइल से नहीं, अपने आसपास के माहौल से बिगड़ रहे हैं।

यदि सही में बच्चों को सुधारना है तो नशीली सामग्री बेचने वालों पर सख्ती करके जेल भेजा जाए। उन पर कार्रवाई नहीं करने वाले पुलिस विभाग पर लगाम कसी जाए और गांव-गांव में खुल रही शराब की दुकानों को बंद किया जाए। जब नशा सामग्री ही नहीं बिकेगी तो बच्चे कैसे बिगड़ेंगे?

छालीवुड अवार्ड पर राजनीति

बालीवुड की तर्ज पर छालीवुड में भी छत्तीसगढ़ी फिल्म, अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देशक, संगीतकार जैसे अनेक कैटेगरी में बेस्ट अवार्ड दिया गया। ज्यादातर अवार्ड पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं हुई। कलाकारों ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। इसके विपरीत शहर के एक डाक्टर, जिन्हें अभिनय का शौक है, भले ही वे छोटे-मोटे रोल करते हैं, जब उन्हें रियल लाइफ हीरो का अवार्ड दिया गया तो यह बात छालीवुड के ज्यादातर लोगों को हजम नहीं हुई।

कलाकारों का कहना है कि न तो डाक्टर ने छालीवुड इंडस्ट्री के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य किया, न ही ऐसा चरित्र निभाया है, जिसे लोग बरसों तक याद रख सकें। रियल लाइफ में भी कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं की। इसके बावजूद छालीवुड रियल लाइफ हीरो का अवार्ड दिया। यह भला कहां तक उचित है? कलाकार एक-दूसरे से कह रहे हैं, पर खुलकर विरोध नहीं जता रहे हैं। कहीं भविष्य में अवार्ड समारोह ही बंद न हो जाए।

Posted By: Pramod Sahu

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