रायपुर। मेडिकल सीटों के आरक्षण रोस्टर, सीट आवंटन से लेकर भर्ती की प्रक्रिया में लगातार मिलती शिकायतों से चिकित्सा शिक्षा विभाग अपनी विश्वसनीयता को खोता जा रहा है। विद्यार्थियों और उनके पालक भटक रहे हैं। प्रवेश को लेकर उनकी शिकायतों, समस्याओं का निराकरण नहीं हो रहा है। विभाग के कुछ कर्मचारी बताते हैं कि यह गलती विभाग के ही कुछ अधिकारियों द्वारा जानबूझकर की जा रही है, ताकि हित साधा जा सके।

शिकायतकर्ताओं की मानें तो अधिकारी उन्हें कहने लगे हैं कि गलत लग रहा तो कोर्ट चले जाओ, वहीं निपटेंगे। जबाव तो शासन दे देगा। ऐसे में निराश होकर छात्र और पालक अब कोर्ट पहुंचने लगे हैं। वहीं, आरक्षण रोस्टर, सीट आवंटन में गड़बड़ी जैसी शिकायतों को लेकर विभाग के खिलाफ कुछ संगठन भी कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव, स्वास्थ्य सचिव की चुप्पी ने एक तरह से विभाग के अधिकारियों को अभयदान दे दिया है।

एनपीए का अनुचित लाभ

मेडिकल कालेजों में निजी प्रैक्टिस नहीं करने वाले चिकित्सकों को नान प्रैक्टिस एलाउंस (एनपीए) के रूप में भत्ता दिए जाने का प्रविधान है। रायपुर मेडिकल कालेज में कई चिकित्सक निजी प्रैक्टिस करने के बाद भी इसका अनुचित लाभ ले रहे हैं। मेडिकल कालेज और अस्पताल में कई चिकित्सकों के समय पर न आने, कार्य स्थल से नदारद रहने, जल्दी चले की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। यह रवैया लंबे समय से है।

ऐसे चिकित्सकों की जानकारी मांगने पर प्रबंधन को सांस सूंघ जाता है। सूचना के अधिकार के तहत भत्ता लेने वाले चिकित्सकों की जानकारी मांगने पर निजी मामला और निजता भंग होने की बात कहते हैं। मनमानी का आलम है। शासकीय सेवा और शासन स्तर पर मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी कब से निजी होने लगी है? कुछ अपवादों, इस तरह की हरकतों से बेहतर सेवा देने और निष्ठा के साथ काम करने वाले चिकित्सक भी पीस जाते हैं।

असुरक्षित महिला कर्मी

सेहतमंद समाज के लिए बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाले स्वास्थ्य विभाग में कुछ सफेदपोश अधिकारियों से महिला कर्मी ही असुरक्षित होने लगी हैं। विभाग के अंदर की बातें चौखट लांघकर चलते फिरते सड़कों पर होने लगे और आक्रोश नजर आए तो वजह गंभीर जरूर है। दरअसल एक अधिकारी अपने सहकर्मी को वाट्सएप पर आपत्तिजनक बातें कर आडियो भेजते रहे। महिला कर्मी ने इसका विरोध किया तो उसकी नौकरी चली गई। जब महिला ने अधिकारी को कड़े लहजे में गलती का अहसास कराया तो आनन- फानन में उसे एजेंसी के माध्यम से घर बैठे वेतन दिया जाने लगा।

अधिकारी की इसी तरह की और शर्मनाक करतूतों को कुछ कर्मचारियों ने रिकार्ड तक कर लिया है। दूसरे मामले में महिला कर्मी से अनबन पर उसका विभागीय रिकार्ड खराब करने की जुगत में एक अधिकारी लगे रहे। उप संचालक स्तर के ऐसे अधिकारियों की बातें विभागीय कर्मी आए दिन सड़कों करते दिख रहे हैं।

संलग्न अधिकारियों की मनमानी

उच्च शिक्षा विभाग में कालेजों से संलग्न हुए अधिकारियों की मनमानी से कर्मचारियों के साथ ही कालेजों से जुड़े कर्मी भी परेशान हैं। कहा जा रहा है कि कालेजों के अध्यापन से जुड़े कई अधिकारी उच्च शिक्षा विभाग में वर्षों से संलग्न होकर कार्यरत हैं। लंबे समय से कार्य करते हुए पहले तो पूरी तरह पैठ जमाई, अब स्थानांतरण, नियुक्ति व जांच प्रक्रिया को बाधित कर हित साधने में लगे हुए हैं। प्रकरणों को अटकाने या काम कराने के लिए मोटी रकम की मांग की जाती है। मांग पूरी नहीं कर पाए तो चक्कर इतना कटवाते हैं कि क्या कहने।

भ्रष्टों के बीच एकजुटता ऐसी है कि नए लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के बीच आने ही नहीं देते। शिकायतकर्ताओं की समस्या यह हो गई है कि शिकायत भी करें तो जांच अधिकारी यही बनते हैं। कर्मचारी भी अब परेशान होकर विभाग से इनकी संलग्नता समाप्त करने का इंतजार कर रहे हैं। अब तो समय ही बताएगा वर्षों से संलग्न अधिकारी मूल पदस्थापना में कब लौटते हैं।

Posted By: Pramod Sahu

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