Raipur Local Edit: रायपुर। प्‍लास्टिक के थैले में आज हर उत्पाद मिलता है। कारखानों से दुकानों तक और दुकानों से घर आते-जाते ये थैलियां कचरे में तब्दील होकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं। इसके कचरे से नालियों जाम हो जाती हैं। खेतों की उर्वरा शक्ति घट जाती है। भूगर्भ पीने योग्य नहीं रह जाता है। रंगीन प्लास्टिक केथैले तो कैंसर समेत कई असाध्य रोगों का कारण बन रहे हैं। ऐसा नहीं है कि लोग इससे होने वाले नुकसान से अंजाम हैं। इसके बावजूद लोग प्लास्टिक के थैले में सामान मांगने में संकोच नहीं करते हैं। वजह साफ है सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगाकर तो अधिकारी आदेश जारी कर चैन से बैठ गए।

प्लास्टिक थैले आज माउंट एवरेस्ट से लेकर समुद्र की तलछटी तक मिल जाएंगे। तीन दशक पहले तक लोग सामान लेने के लिए घरों से थैले लेकर निकलते थे, लेकिन आज हर कोई खाली हाथ यह सोचकर और निश्चित होकर निकलता हैं कि दुकानदार तो प्लास्टिक थैलियों में सामान देगा ही। केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार एक व्यक्ति एक साल में छह से सात किलो प्लास्टिक थैलियों से कचरा फैलाता है। पर्यावरण विज्ञानियों ने प्लास्टिक के 20 माइक्रोन या इनसे पतले उत्पाद पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। ऐसी थैलियां मिट्टी में दबने के बाद फसलों के मित्र कीटों को मार देती हैं। बरसात में नालियों में जाम ये थैलियां पानी का बहाव रोक देती हैं और पानी जमा होने से उनमें से दुर्गंध आती है। बारिश का पानी नहीं निकल पाता है। इससे गलियोंं व सड़कोंमें नालों-नालियों का पानी भर जाता है।

देश में छत्तीसगढ़ समेत 19 राज्यों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध है। राज्य में 50 माइक्रान से कम वाली प्लास्टिक के थैले पर रोक है, पर इसका असर नजर नहीं आ रहा है। दुकानदार सरेआम प्लास्टिक की थैलियों में सामान दे रहे हैं तो लोग भी बेखौफ होकर इसका उपयोग कर रहे हैंं। जाहिर है कि इसका उत्पादन भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। राजधानी में गत दिनों बारिश जल-भराव का सामना करना पड़ा, क्योंकि प्लास्टिक थैलियों के कचरे से नाले और नालियां जाम थीं।

आवास और पर्यावरण विभाग ने प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध को लेकर आदेश जारी किए गए थे। इसमें कहा गया था कि कोई भी उद्योग प्लास्टिक कैरी बैग, पीवीसी कप, गिलास, प्लेट, कटोरी, चम्मच का निर्माण, भंडारण, विक्रय, परिवहन, आयात व उपयोग दुकानदार, उद्योग, वेंडर, थोक व खुदरा विक्रेता नहीं करेंगे। व्यापारी और दुकानदारों को 100 रुपये केस्टांप पेपर पर इसकेउपयोग नहीं करने का शपथ पत्र देना होगा। इसके बावजूद राज्य में इसका उत्पादन और उपयोग बेखौफ होकर किया जा रहा है। प्रशासन को दोनों ही स्तर पर रोक लगाने के लिए कागजी खानापूर्ति करनेे की बजाय जमीन पर काम करने की जरूरत है।

Posted By: Kadir Khan

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