रायपुर। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सोमवार को लंबे समय बाद प्रदर्शन किया। दो दशक पहले तक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में पूरे देश में स्थापित पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की आक्रामकता सत्ता प्राप्ति के बाद प्रदेश में भी शिथिल पड़ी हुई थी।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदेव साय सहित प्रमुख नेताओं, सांसदों और विधायकों ने तेज धूप और भीषण गर्मी के बावजूद जिस तरह प्रदर्शन में भागीदारी की, उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि अगले वर्ष प्रस्तावित चुनाव के लिए भाजपा की तरफ से अभी से माहौल बनाने का काम शुरू कर दिया गया है।

यह चुनौती इसलिए भी गंभीर हो चुकी है, क्योंकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में 'भेंट-मुलाकात" कार्यक्रम के जरिए प्रदेश सरकार सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में जनता के बीच पहुंचने के प्रयास में पहले ही जुट चुकी है। पहले चरण में मुख्यमंत्री स्वयं उत्तरी छत्तीसगढ़ में जनता से सीधे संवाद के जरिए ठोस निर्णय लेते हुए सामने आए हैं। छत्तीसगढ़ प्रशासनिक सेवा से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा तक के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है।

इस तरह सरकार यह स्थापित करने के प्रयास में है कि जनता के हितों की उपेक्षा करने वाले किसी भी अधिकारी पर कार्रवाई हो सकती है। रणनीतिकार सरकार की छवि को जनहितैषी बनाने में जुटे हुए हैं और उन्हें प्राथमिक चरण में सफलता भी मिली है। मुख्यमंत्री की 'भेंट-मुलाकात" का दूसरा चरण जल्द ही बस्तर से शुरू होने वाला है। कहा जा सकता है कि इन परिस्थितियों के बीच हाशिए पर खड़े मुख्य विपक्षी दल ने आंदोलन के जरिए निराश कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की है।

भाजपा के अंदर ही नेतृत्व परिवर्तन की बात काफी मजबूती से उठ रही है। भाजपा के अंदर ही एक बड़े वर्ग का मानना है कि वर्तमान नेतृत्व अगले चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। पार्टी प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी भी स्पष्ट रूप से कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं। इन सबके बावजूद पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी से जुड़े और लाभान्वित लोगों की संख्या कम नहीं है। नेताओं के समक्ष आंदोलन के माध्यम से खुद को साबित करने की चुनौती है। पार्टी ने धरना-प्रदर्शन के पहले सरकार की अनुमति और 19 बिंदुओं के अनिवार्य अनुपालन की नई सरकारी व्यवस्था के विरोध के बहाने उन कर्मचारी संगठनों और प्रदर्शनकारियों की भी सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की है, जिन्हें पिछले महीने सरकारी दिशा निर्देश के बाद रातों-रात धरना स्थल से हटा दिया गया।

इससे बूढ़ातालाब में महीनों से जमे कर्मचारी भी प्रभावित हुए तो नवा रायपुर के किसान भी। भाजपा इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकारी प्रहार करार दे रही है। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि आम जनता से लेकर विपक्ष के नेताओं तक को सत्ता पक्ष के खिलाफ आंदोलन, प्रदर्शन और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अधिकार मिल जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विपक्ष के सक्रिय होने से सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आएगी और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी।

Posted By: Ravindra Thengdi

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