रायपुर। बिलासपुर से सांसद अरुण साव को छत्तीसगढ़ भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपे जाने के साथ ही प्रदेश में राजनीतिक गर्मी बढ़ने की परिस्थितियां निर्मित होने लगी हैं। कांग्रेस ने पहले ही दिन आक्रामकता दिखाते हुुए आरोप लगाया कि विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर कम से कम एक दिन के लिए इस परिवर्तन को टाला जाना चाहिए था।

सौम्य प्रकृति वाले जशपुर के सीधे-सादे आदिवासी नेता विष्णुदेव साय प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए अनुकूल थे। प्रदेश सरकार के खिलाफ बयान देने से लेकर प्रदर्शन करने तक की घटनाओं में उनका व्यक्तित्व प्रभावी रहा। विपक्ष और विरोध की राजनीति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित रही भाजपा की आक्रामकता पर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं, कि प्रदेश में डा. रमन सिंह के नेतृत्व में 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के कारण प्रदेश के भाजपा नेता विपक्ष की भूमिका ही भूल चुके हैं।

डा. रमन का व्यक्तित्व सत्ता में शामिल रहे नेताओं के समक्ष बरगद की तरह स्थापित रहा है जिसके आसपास नए नेताओं के पनपने की संभवाएं क्षीण मानी जा रही थीं। यही कारण है कि प्रदेश में जमीन से जुड़े नेता भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही भाजपा के स्थानीय नेता नेतृत्व परिवर्तन के लिए बेचैन थे। डा. रमन सिंह और बृजमोहन अग्रवाल के नेतृत्व में प्रदेश भाजपा दो खेमों में बंटी रही और पिछले तीन वर्षों में कम ही अवसर आए जब कांग्रेस के समक्ष गंभीर असहज स्थिति उत्पन्न् हुई हो।

रमन सिंह ने जब भी आक्रामक होने की कोशिश की, कांग्रेस के प्रवक्ताओं के साथ-साथ खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पनामा पेपर्स और नान घोटाले की बात उठाकर उलटा दबाव बनाने का मौका नहीं छोड़ा। माना जा रही है कि इसी कारण से भाजपा अध्यक्ष के रूप में सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे अरुण साव का चेहरा सामने लाया गया है। वह पहली बार ही सांसद बने हैं तथा किसी भी गुट के प्रभाव की परिधि से बाहर हैं। बदलाव की इसी प्रक्रिया में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धर्मलाल कौशिक की जगह नए नाम की भी चर्चा है।

प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा में अब बमुश्किल सवा साल बचा है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के समक्ष निर्णय टालने के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है। बृजमोहन अग्रवाल के साथ अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल और प्रेम प्रकाश पांडेय जैसे आक्रामक नेता हैं परंतु उम्मीद की जा रही है कि पार्टी नेतृत्व नए चेहरों को मौका देने के विकल्प पर गंभीरता से विचार करेगा।

संगठन के लोगों के बार-बार के दौरे परिवर्तन के संकेत तो कर रहे थे परंतु प्रदेश का पार्टी नेतृत्व अटल-आडवाणी युग की विरासत को ही संभाले हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की जो आक्रामक छवि राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हुई है, प्रदेश में उसका दूर-दूर तक दर्शन नहीं होता। राज्य की वर्तमान स्थिति में कहना गलत नहीं होगा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समक्ष चुनौती खड़ी करने के लिए भाजपा को अभी काफी मेहनत करनी पड़ेगी।

Posted By: Pramod Sahu

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