रायपुर। प्राकृतिक आपदा को रोका तो नहीं जा सकता, परंतु बेहतर प्रबंधन करके नुकसान को नियंत्रित जरूर किया जा सकता है। देश-दुनिया में इसके उदाहरणों की कमी नहीं है। मानव विकास का इतिहास यही बताता है कि बुद्धि-विवेक और तकनीक का प्रयोग करते हुए विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य जीवन को आसान बनाने में सक्षम रहा है। प्रदेश में रिकार्ड बारिश के कारण हो रहे नुकसान के बीच यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि प्रदेश सरकार की तरफ से चुनौतियों से निपटने के लिए क्या प्रबंधन किए गए थे?

धान खरीदी में हुई देरी के कारण किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई किस तरह की जाएगी? पिछले वर्षों में नुकसान के बाद हुए सरकारी सर्वेक्षणों से किसानों को कितना लाभ हुआ? यह सवाल ताजा नहीं है। हर वर्ष उठता है। परेशानी इस बात की है कि समाधान के लिए सार्थक प्रयास नहीं किए जाते। सरकार की तरफ से सिर्फ घोषणा ही हो पाती है, क्योंकि अधिकारियों की रिपोर्ट पूरी नहीं हो पाती। पंजाब और हरियाणा के किसानों की स्थिति इसलिए बेहतर हुई, क्योंकि वहां मंडियों की व्यवस्था सुदृढ़ है। किसान सजग हैं। सरकारों ने जनहित का ध्यान रखा। प्रदेश में दिसंबर महीने में बारिश ने 10 वर्ष पुराना रिकार्ड तोड़ दिया है।

अंबिकापुर से लेकर कवर्धा तक में ओले पड़े हैं। राजधानी रायपुर के साथ-साथ दुर्ग-भिलाई, बिलासपुर, कोरिया, सूरजपुर, बेमेतरा आदि जिलों में बारिश जारी है। किसानों का दर्द है कि मौसम की मार पड़ने के बाद सर्वेक्षण होता है, परंतु मुआवजा नहीं मिल पाता। पिछले वर्ष के मुआवजे का भी भुगतान नहीं हुआ है। सब कुछ फाइलों में फंसा है। धान खरीदी केंद्रों पर पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण पानी भर गया है। जल निकासी और धान ढंकने की व्यवस्था की पोल खुल गई है। समय से टोकन नहीं मिलने के कारण किसानों के घरों में रखा धान भी भीग रहा है।

प्रदेश सरकार ने 105 लाख टन धान खरीदी का लक्ष्य रखा है, परंतु समितियों के जरिए एक दिसंबर से शुरू हुई खरीदारी अभी आधे तक भी नहीं पहुंच सकी है। धीमी गति से उठाव के कारण समितियों द्वारा खरीदे जा चुके धान का 75 फीसद हिस्सा अभी भी मंडियों में पड़ा है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सक्रियता दिखाते हुए सभी जिलों में बारिश और ओलावृष्टि से हुई क्षति का आकलन करने और धान खरीदी केंद्रों में पानी की निकासी तथा धान सुरक्षित रखने की व्यवस्था का आकलन करने के निर्देश दिए हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि विभागीय मंत्री और अधिकारी भी इसी तरह की सक्रियता दिखाते हुए आवश्यक कदम उठाएंगे। रबी फसलों पर भी इस बारिश का बुरा प्रभाव रहेगा। फल-सब्जियों पर भी प्रभाव पड़ेगा। उनकी कीमतों में भी उछाल आएगी। 70 फीसद से अधिक ग्रामीण आबादी वाले प्रदेश की अर्थव्यवस्था के हित में यही होगा कि पहले से ही आवश्यक प्रबंध किए जाएं।

Posted By: Sanjay Srivastava

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