रायपुर। नक्सलियों की दंडकारण्य स्पेशल जोन कमेटी के प्रभारी रहे दुर्दांत नक्सल कमांडर रमन्न्ा की मौत के बाद उसकी पत्नी सावित्री का तेलंगाना में आत्मसमर्पण सुरक्षाबलों के इस दावे को आधार दे रहा है कि एक साल के अंदर छत्तीसगढ़ भी नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा। मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड को पहले ही नक्सल-मुक्त किया जा चुका है। महाराष्ट्र और ओडिशा में भी नक्सली काफी हद तक नियंत्रित किए जा चुके हैं।

झारखंड में एक करोड़ रुपये के इनामी प्रशांत बोस और बिहार में इतने के ही इनामी मिथिलेश महतो उर्फ भिखारी का आत्मसमर्पण केंद्रीय सुरक्षा बल के महानिदेशक कुलदीप सिंह के दावों को पुष्ट करता है कि बड़े नक्सल नेता गिरफ्तार हो गए हैं या मार गिराए गए हैं। झारखंड और बिहार के बूढ़ा पहाड़ और भीमबांध जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सुरक्षाबलों के स्थायी शिविर स्थापित हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में भी नक्सलियों के खिलाफ शून्य सहनशीलता नीति ने प्रभाव दिखाया है।

इसकी वजह से दुर्गम स्थानों पर नक्सलियों पर नियंत्रण और कार्रवाई के लिए 19 फारवर्ड आपरेशन बेस तैयार किए जा चुके हैं। सावित्री के पहले उसके और रमन्न्ा के बेटे रंजीत उर्फ श्रीकांत ने भी पिछले वर्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। यह स्थिति नक्सल विचारधारा के कमजोर पड़ने और दिशाहीन होने के कारण ही बनी है। इसमें दो राय नहीं कि नक्सलियों का साम्राज्य बिखरने की स्थिति में है। सावित्री 1992 से 2021 तक नक्सल हमलों में सक्रिय रही और कोंटा एरिया कमेटी की प्रभारी की भूमिका निभाती रही।

गरीबों और आदिवासियों की जिंदगी को और मुश्किल भरा बनाते हुए विकास की मुख्यधारा से अलग करने वाले नक्सलियों के कमजोर होने का सीधा लाभ उस क्षेत्र के लोगों को होने जा रहा है। ग्रामीण और वन क्षेत्रों में नक्सलियों का प्रभाव होने के कारण वहां रहने वाले लोगों को शिक्षा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। सड़क और फोन जैसी सुविधाओं के विकास में भी लगातार बाधक बनने वाले नक्सलियों के प्रति क्षेत्र के आम लोगों में तिरस्कार का भाव है। अभी भी कई क्षेत्रों में रैलियों में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति का मुख्य कारण सुरक्षा का अभाव ही होता है।

मानवाधिकार के नाम पर नक्सलियों का समर्थन करते रहे बौद्धिक वर्ग ने क्षेत्र की आम जनता का काफी नुकसान किया है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में इस वर्ष मार्च से अब तक नक्सली एक भी हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा सके हैं। ट्रेनों का परिचालन अभी तक संभव नहीं हो पाना दुखद है। क्षेत्र की जनता ही समझ सकती है कि बस्तर अंचल का रायपुर से रेल मार्ग से नहीं जुड़ पाने का कितना नुकसान हो रहा है। प्राइवेट बसों और हवाई मार्ग का किराया आम बस्तरवासियों पर भारी पड़ता है। धमतरी, कांकेर और कोंडागांव होते हुए ट्रेन मार्ग का काम लटका हुआ है।

कार्य में बाधा डालने वालों को क्षेत्र की जनता माफ नहीं करेगी। अब परिस्थितियां बदल रही हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार होने के कारण नई पीढ़ी को भ्रमित करना आसान नहीं रह गया है। सीआरपीएफ द्वारा नक्सलियों के सफाए के दावों में दम है और उम्मीद की जानी चाहिए कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र की जनता के लिए विकास और संपन्न्ता की नई शुरुआत होगी।

Posted By: Pramod Sahu

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