रायपुर। राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने वालों को त्वरित उपचार उपलब्ध कराने के लिए नए सर्व सुविधायुक्त ट्रामा सेंटरों की स्थापना का मार्ग प्रस्त हो गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिन ने राज्य के विभिन्न् नगरों में 12 ट्रामा स्टेबलाइजेन सेंटर्स की स्थापना की स्वीकृति दी है। ट्रामा सेंटरों की स्थापना से विश्ोषकर दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने वाले कई लोगों की जिंदगी बचाई जा सकेगी। यह दुर्भाग्यपूणर््ा है कि राज्य में सड़क दुर्घटनाओं के पश्चात समय पर समुचित उपचार की व्यवस्था न होने से कई लोगों का जीवन समाप्त हो जाता है। दुर्घटना के पश्चात के एक घंटे के समय को घायल व्यक्ति के लिए गोल्डन आवर कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि एक घंटे के अंदर सही उपचार मिल जाए तो घायल व्यक्ति का जीवन बचाया जा सकता है।

दुर्घटना में घायल अधिकां लोगांे की जान अधिक रक्तस्राव से होती है। इसका कारण यह है कि राष्ट्रीय राजमार्गों से कई किलोमीटर दूर तक उपचार की समुचित व्यवस्था ही नहीं होती है। राज्य में वर्तमान में नौ ट्रामा सेंटर हैं। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग आदि बड़े हरों में गंभीर रूप से घायल व्यक्तियों के उपचार की व्यवस्था तो है परंतु समय पर इन अस्पतालों तक घायलों को पहुंचाना बड़ी चुनौती है। राज्य के सुदूर क्षेत्रों से घायलों को बड़े हरोें तक पहुंचाने मंे बहुत समय लगता है। कई घायलों की मृत्यु रास्ते में एंबुलेंस में ही हो जाती है। सड़क दुर्घटनाओं की ही बात नहीं है। बस्तर में नक्सल मोर्चे पर घायल हुए जवानों के उपचार की समुचित व्यवस्था वहां नहीं है। मुठभेड़ स्थल से घायल जवानों को एयरलिफ्ट कर रायपुर या अन्य हरों तक पहुंचाने के दौरान मृत्यु की कई कई घटनाएं हो चुकी हैं। इससे यह तो समझा ही जा सकता है कि यहां ट्रामा सेंटरों की कितनी अधिक आवश्यकता है।

विश्वभर में सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतांे का आंकड़ा युद्ध या महामारी से होने वाली मौतों से बहुत अधिक है। छत्तीसगढ़ में प्रतिवर्ष औसतन पांच से छह हजार लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में होती है। राज्य के यातायात विभाग ने अब स्वास्थ्य विभाग से संपर्क कर ट्रामा सेंटरों की स्थापना कराने की पहल की है। प्रदे के अधिकां जिला अस्पताल वर्तमान में रेफरल सेंटर ही बने हुए हैं। इन्हीं अस्पतालों का उन्न्यन कर ट्रामा स्टेबलाइजेन संेटर की सुविधाएं विकसित की जाएंगी। ट्रामा सेंटर में जटिल आपरेन भी किए जाने की सुविधा होती है। विश्ोषज्ञ डाक्टर, सर्जन व नर्सिंग टीम होती है। आधुनिक आपरेन थियेटर होता है। उपयुक्त दवाओं की व्यवस्था होती है।

राज्य में ट्रामा सेंटरों की संख्या बढ़ाने की पहल तो की जा रही है किंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि इन सेंटरों में सभी सुविधाएं हों। खानापूर्ति के लिए बने ट्रामा सेंटर से कोई लाभ नहीं होने वाला है। यह देखा गया है कि अस्पतालों के भवन व उपकरण की व्यवस्था तो कर ली जाती है परंतु चिकित्सक नहीं होते हैं। यही कारण है कि कई जिला अस्पतालों में जांच की आधुनिक मीनें अनुपयोगी पड़ी हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ट्रामा सेंटर सर्व सुविधा संपन्न् होंगे और घायलों की जीवन रक्षा करने में सफल होंगे।

Posted By: Pramod Sahu

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