रायपुर। आदिवासी बहुल प्रदेश में विशेष पिछड़ी जनजातियों के युवाओंे को राज्य सरकार ने नौकरी में अवसर का उपहार दिया है। केंद्र सरकार की सूची में प्रदेश के अबूझमाड़िया, पहाड़ी कोरवा, बैगा, बिरहोर और कमार विशेष पिछड़ी जनजाति के रूप में शामिल हैं। इन्हें राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र भी कहा जाता है। इनके अलावा पंडो व भुंजिया जनजातियां भी राज्य सरकार की विशेष पिछड़ी जनजाति की सूची में शामिल हैं।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विशेष पिछड़ी जनजातियों के युवाओं के लिए तृतीय और चतुर्थ वर्ग मेें सीधी भर्ती के लिए 9,623 पदों की घोषणा की है। जशपुरनगर में भेंट-मुलाकात कार्यक्रम के दौरान एक युवती की मांग पर मुख्यमंत्री ने मंच से ही यह घोषणा कर दी। राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से त्वरित व साहसिक निर्णयों के लिए पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री की यह घोषणा काफी महत्वपूर्ण है। आजादी के 75 साल बाद भी विशेष पिछड़ी जनजातियों के जीवन में ज्यादा परिवर्तन नहीं आ पाया है।

केंद्र व राज्य सरकार की ओर से इन जनजातियों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं का पूरा लाभ शायद ही कभी मिल पाया है। अबूझमाड़िया जनजाति के लोग आज भी सघन वनों में रहते हुए शिकार पर निर्भर हैं। बैगा पहाड़ों पर रहते हैं और नीचे आना ही नहीं चाहते हंै। पहाड़ी कोरवा व अन्य जनजातियों की भी विशेष जीवन श्ौली है। बदलती हुई परिस्थितियों में इन वर्गों के बच्चे भी पढ़ाई करके अपना जीवन बदलना चाहते हैं। नई पीढ़ी अपने परिवार और समाज की उन्न्ति चाहती है।

मुख्यमंत्री तो इस बात को समझ रहे हैं परंतु उनके निर्णयों पर अफसरशाही कितनी तेजी से अमल करती है, यह प्रश्न अवश्य विचारणीय है। अब तक का अनुभव तो यही बताता है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर क्रियान्वयन के मामले में अफसरशाही की गति अपेक्षाकृत रूप से काफी धीमी है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद 30 मई, 2019 को मुख्यमंत्री बघेल ने जगदलपुर में बस्तर विकास प्राधिकरण की बैठक के दौरान आदिवासी बहुल बस्तर व सरगुजा के युवाओें को स्थानीय स्तर पर नौकरियों में विशेष अवसर प्रदान करने के लिए कनिष्ठ सेवा चयन बोर्ड के गठन की घोषणा की थी।

दो साल बाद 2021 में बेहद धीमी गति से भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई है। अवसरों के संदर्भ में देखा जाए तो बस्तर संभाग में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के 11 हजार पद रिक्त हैं, जबकि तीन साल में कुल 400 भर्तियां ही की जा सकी हैं। इस साल 700 और पदों को भरने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। उसी बैठक में मुख्यमंत्री ने इंद्रावती विकास प्राधिकरण के गठन की घोषणा भी की थी। तीन साल बाद उक्त घोषणा राजपत्र में प्रकाशित होने से आगे नहीं बढ़ पाई है।

प्रदेश की स्थितियों और परिस्थितियों के दृष्टिगत मुख्यमंत्री की घोषणाओं को लोकलुभावन नहीं कहा जा सकता, परंतु कार्यपालिका द्वारा अपनाई जाने वाली जटिल प्रक्रिया अक्सर कार्यान्वयन में देरी का कारण बनती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विशेष पिछड़ी जनजाति के युवाओं को नौकरी देने के मामले में अफसर अपेक्षित सक्रियता दिखाएंगे।

Posted By: Pramod Sahu

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