रायपुर। केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने के बाद जीवन और पर्यावरण बचाने के लिए जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाना आवश्यक हो गया है। आम लोगों के साथ-साथ कारोबारियों को भी समझना होगा कि यह प्रतिबंध अति आवश्यक है। पिछले 23 वर्षों से चल रही बहानेबाजी की समस्या ही बढ़ी है।

अब समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि कहना उचित होगा कि पानी सिर के ऊपर से निकलने लगा है। बारिश के मौसम में सभी छोटे-बड़े नालों के जाम होने में पालीथिन सहित सिंगल यूज प्लास्टिक की भूमिका को हर व्यक्ति स्वयं देख और समझ सकता है। नाले और नालियों के जाम होने का अर्थ डायरिया से लेकर डेंगू तक सभी प्रकार के रोगों को निमंत्रण है। साफ-सफाई से लेकर इलाज पर होने वाले खर्च का आकलन किया जाए तो सिंगल यूज प्लास्टिक के कारोबार से जुड़े लोगों की आमदनी से कहीं ज्यादा होगा।

प्लास्टिक के कारण कैंसर सहित अन्य बीमारियों के कारण लोगों की मौत की भरपाई तो बहुत दूर की बात होगी। दुखद है कि प्रतिबंध का प्रभाव अभी भी नहीं दिख रहा है। बाजार में सब कुछ पूर्व की तरह चल रहा है। प्रबल आशंका है कि प्रदेश में प्रतिबंध की प्रक्रिया एकबार फिर कागजी साबित होगी। कार्यपालिका की शिथिलता भारी पड़ेगी। सामाजिक नेतृत्व के साथ आम लोगों को ही इसके लिए जागरूक नागरिक की भूमिका निभाते हुए आगे आना होगा।

प्रति माह एक हजार टन खपत को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में सिंगल यूज प्लास्टिक की समस्या को समझा जा सकता है। दोबारा उपयोग की तकनीक और व्यवस्था के अभाव में एक तरफ तो सिंगल यूज प्लास्टिक वातावरण में पड़े-पड़े जहरीले रसायन छोड़ता रहता है तो दूसरी तरफ जलाने पर जहरीली गैस निकलती हैं। ऐसे में हर घर के सहयोग के बिना सफलता नहीं मिल सकती। जरूरी है कि कार्यान्वयन और निगरानी के लिए जिम्मेदार विभाग और उनके अधिकारी संवेदित हों और मामले की गंभीरता को देखते हुए ठोस कार्रवाई करें। यद्यपि सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल पर जेल और जुर्माने का प्रविधान है, परंतु यह भी सत्य है कि सिर्फ दंडित करने से बात नहीं बनेगी।

लोगों को ईको-फ्रेंडली का विकल्प चुनना होगा। किराना, सब्जी आदि लेते जाते वक्त प्लास्टिक थैलियों के बजाय कपड़े की थैलियों का इस्तेमाल करना होगा। आदतों में बदलाव के लिए सख्ती किए जाने की आवश्यकता है। छत्तीसगढ़िया जीवन शैली काफी हद तक प्रकृति पर निर्भर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी दोना-पत्तलों का बहुतायत उपयोग होता है।

प्लास्टिक मुख्य रूप से शहरी और जंग फूड जेनरेशन की समस्या है। जैविक पदार्थों से बने उत्पादों का सुगम और सस्ता विकल्प उपलब्ध कराना होगा। सरकार को ऐसी व्यवस्था पर ध्यान देना होगा, जो प्लास्टिक से मुक्ति के साथ साथ स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देते हुए समृद्धि का कारक भी बन सके। प्रतिबंध की सफलता में राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिबद्धता अहम है। पर्यावरण और जीवन हित में छोटे-बड़े सभी को थैला तो उठाना ही होगा।

Posted By: Pramod Sahu

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