रायपुर। छत्तीसगढ़ में मानसिक समस्या से पीड़ित वयस्कों की बढ़ती संख्या चिंताजनक है। तीन साल पहले के आंकड़े बता रहे हैं कि इस प्रदेश का हर पांचवा व्यक्ति मानसिक समस्या से ग्रसित है। वहीं डाक्टरों के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे समस्याग्रस्त लोगों की संख्या और भी बढ़ गई है। ढाई साल पहले राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया गया था, ताकि देश में मानसिक रोगियों का समुचित उपचार किया जा सके।

समय-समय पर उनकी काउंसिलिंग की जा सके। छत्तीसगढ़ में तीन साल के बाद राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का विश्लेषण करें तो परिणाम निराशाजनक लगते हैं और यह भी स्पष्ट होता है कि इस दिशा में बहुत कुछ करने की जरूरत है, सरकारी स्तर पर और समाजसेवी संगठनों और विभिन्न् संगठनों के माध्यम से भी।

ढाई साल से करोना संक्रमण की चपेट में पूरा देश बुरी तरह प्रभावित रहा। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है। कई महीनों तक उद्योग जगत से लेकर बाजार और कारपोरेट सेक्टर में बंद के हालात रहे। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों ने अपने रोजगार गंवा दिए।

छत्तीसगढ़ में इन परिस्थितियों के चलते बड़ी संख्या में हर उम्र के लोगों को अवसाद घेरने लगा। राज्य में मानसिक समस्या से पीड़ित लोगों की बढ़ती संख्या का एक बड़ा कारण यही अवसाद भी है। प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्र के लिए 10 से 15 लाख रुपये का वार्षिक बजट उपलब्ध कराया जाता है लेकिन तीन वर्षों में एक बार भी मानसिक रोगों से संबंधित दवाओं की आपूर्ति नहीं की गई।

मानसिक रोगियों के प्रति यह केंद्र सरकार की गंभीर लापरवाही है और इसे उच्च स्तर पर संज्ञान में लाया जाना चाहिए। सरकार के पास दावे तो बहुत है कि स्वास्थ्य केंद्रों में मानसिक रोगियों की समुचित देखभाल की जाती है। उनकी और उनके स्वजनों की काउंसिलिंग की जाती है और बताया जाता है कि उन्हें क्या करना चाहिए और किससे बचना चाहिए। फिर भी जब आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा जाता है तो स्थिति शून्य में खड़े होने जैसे लगती है।

छत्तीसगढ़ में अवसाद और मादक पदार्थों के सेवन के अलावा तनाव, मतिभ्रम, उन्माद, दुष्चिंता को भी बढ़ते मानसिक समस्याग्रस्त लोगों का कारण बताया गया है। सोचने वाली बात तो यह भी है कि मानसिक समस्याग्रस्त लोगों को आज भी हमारे प्रगतिशील समाज में खुले मन से स्वीकार नहीं किया जाता। बढ़ती मानसिक रोगियों की संख्या को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अकेले सरकार की ही नहीं बल्कि इसके लिए हर समाज, समाजसेवी संगठनों को भी नए सिरे से प्रयास करना होगा।

उन्हें समाज में वह सम्मान देना होगा, जिसके वे हकदार है और जो आम सामाजिक सदस्य को मिलता है। स्वास्थ्य की दिशा में कार्यरत सेवाभावी संस्थाओं को आगे आकर उनके इलाज, काउंसिलिंग को लेकर सामने आना चाहिए। इसी तरह स्वजनों पर भी अपने परिवार के मानसिक समस्याग्रस्त सदस्य के प्रति अतिरिक्त सावधानी बरतने और आत्मीय व्यवहार करने की जरूरत है, जबकि जितनी जल्दी हो सके उनसे छुटकारा पाने की मानसिकता से व्यवहार किया जाता है।

Posted By: Pramod Sahu

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