रायपुर। Raipur local Editorial प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सालय, डा. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में व्यवस्था की कमी के चलते कई गंभीर बीमारियों की जांच का नहीं हो पाना चिंता का विषय है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब राजधानी में स्वास्थ्य सेवाओं का यह हाल है तो प्रदेश के पिछड़े जिलों के सरकारी चिकित्सालयों में क्या स्थिति होगी। किसी भी बीमारी के सही उपचार के लिए उसका पता लगना पहली प्राथमिकता होती है। इसके लिए ही लैब में विभिन्न प्रकार की जांच होती है। ऐसे में मरीज या तो अधिक रुपये खर्च करके बाहर की लैब में जांच कराएं, अन्यथा बिना उपचार के ही मौत की ओर बढ़ने को मजबूर हो जाएं।

आंबेडकर अस्पताल में किट की किल्लत के चलते कैंसर, टीबी, डेंगू, टायफाइड सहित अन्य बीमारियों की जांच नहीं हो पा रही है। विटामिन-डी, बी-12, हार्मोनल से जुड़ी जांच यहां छह महीने पहले से ही बंद है। किट नहीं होने से एंटीबायोटिक सेंसिविटी, ब्लड कल्चर, ट्यूमर मार्कर जैसी महंगी जांच भी अब यहां नहीं हो रही है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार अपनी जवाबदारी से नहीं बच सकते। स्वास्थ्य सेवा में इस तरह की लापरवाही व मनमानी पूरी तरह से अमानवीय है। इस मामले में आंबेडकर अस्पताल के अधीक्षक डा. एसबीएस नेताम स्वीकार कर रहे हैं कि किट की कमी के चलते आंबेडकर अस्पताल में कई जांच बंद हैं। साथ ही वे यह भी कह रहे हैं कि इसके पीछे क्या कारण है, यह डीन ही बता पाएंगी।

पं. जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कालेज की डीन डा. तृप्ति नागरिया तर्क दे रही हैं कि छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कारपोरेशन (सीजीएमएससी) को जांच किट की आपूर्ति के लिए दो से तीन बार पत्र लिख गया है, लेकिन किट अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई है। वहीं सीजीएमएससी के एमडी अभिजीत सिंह स्वीकार कर रहे हैं कि मेडिकल कालेज से जांच किट की मांग आई है। इसकी आपूर्ति अब तक क्यों नहीं की गई, इसका पता लगवाते हैं। कितनी अजीब बात है कि एक ओर गरीब मरीज जांच के अभाव में तिल-तिल मरने को मजबूर है और दूसरी ओर सारे जिम्मेदार जिस काम के लिए वेतन लेते हैं उसी में पूरी तरह नाकाम हैं तथा किसी तरह खुद को बचाने के बहाने गढ़ रहे हैं।

इस बात की गंभीरता को इस तरह समझा जा सकता है कि आंबेडकर अस्पताल में आने वाले कैंसर, टीबी, लिवर, हृदय, टायफाइड, डेंगू, बैक्टीरिया इंफेक्शन आदि बीमारियों से जुड़े मरीजों का इलाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। चिकित्सकों के अनुसार गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के शरीर में होने वाले संक्रमण का पता लगाने के लिए खून, पेशाब आदि की कल्चर जांच की जाती है। इसके बाद एंटिबायोटिक की उपयोगिता की पुष्टि के लिए एंटीबायोटिक सेंसिविटी जांच होती है, जो मरीजों का इलाज तय करती है। यह जांच टीबी, टायफाइड, एचआइवी रोगियों, बच्चों, आइसीयू में भर्ती मरीजों आदि के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन यह सब जांच वर्तमान में बंद है। उम्मीद की जानी चाहिए कि स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव इस गंभीर विषय को संज्ञान में लेकर उचित कदम उठाएंगे। सारे जिम्मेदार भी यह महसूस करेंगे कि जिंदगी बचाने जैसे महत्वपूर् कार्य का हिस्सा बनने का उन्हें सौभाग्य मिला है और वे इसके प्रति निष्ठा से पीछे नहीं हटेंगे।

Posted By: Vinita Sinha

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