रायपुर। देश की 10 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ताओं को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिनेवा में ग्लोबल हेल्थ लीडर्स पुरस्कार से सम्मानित किया, यह देश के साथ-साथ अपने प्रदेश के लिए भी अत्यंत गर्व की बात है। आशा कार्यकर्ताओं को छत्तीसगढ़ में मितानिन कहा जाता है। वर्ष 2002 में पायलट परियोजना के तहत राज्य के आठ विकासखंडों में मितानिन कार्यक्रम शुरू किया गया था।

बाद में यह कार्यक्रम पूरे प्रदेश में शुरू हो गया। राज्य में मितानिनें टीकाकरण से लेकर समुदाय स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाएं दे रही हैं। आज प्रदेश में कुपोषण, मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर में कमी तथा महिलाओं में संस्थागत प्रसव, व्यक्तिगत स्वच्छता आदि के प्रति जागरूकता आई है तो इसमें मितानिनों का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रदेश के सुदूर अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपस्थिति मितानिनों के भगीरथ प्रयास से ही संभव हुई है। वर्तमान में लगभग 72 हजार मितानिन स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ के रूप में कार्य कर रही हैं, लेकिन उनका वेतन और अन्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि वे भी आर्थिक रूप से मजबूत होकर निश्चिंत भाव से कार्य कर सकें।

प्रदेश में मितानिनें अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही हैं। यह दुर्भाग्य ही है कि विश्व स्तर पर सम्मान पा रहीं आशा दीदी राज्य में अपनी मांगों के लिए महीनों से धरने पर बैठी हैं। उनकेसम्मानित होने पर हम गर्व महसूस कर रहे हैं। जब वे अपने अधिकारों के लिए अकेले लड़ रही थीं तो क्या एक संस्थापक के रूप में राज्य के लिए शर्म का विषय नहीं था? यदि उनकी सेवा राज्य के लिए इतनी महत्वपूर्ण थी तो उनकी मांगों पर विचार करने और उन्हें पूणर््ा करने में महीनों क्यों लग गए? जनसेवा के बदले उन्हें जो सम्मान और वेतनमान मिलना चाहिए था, वे काफी हद तक उनसे वंचित हैं।

100 फीसद राज्य अंश और प्रोत्साहन राशि के अतिरिक्त प्रति माह पांच हजार रुपये, अतिरिक्त अन्य सभी कार्य के लिए भी राशि, भविष्यनिधि राशि जमा करने की मांग, मृत्यु या काम करने में असमर्थता की स्थिति में चयन में उनकेस्वजन को प्राथमिकता आदि की मांगें उनके योगदान के मुकाबले न्याय संगत प्रतीत होती हैं। आदिवासी या सुदूर अंचलों में जन जागरूकता फैलानी हो या वैश्विक महामारी कोरोना काल में घर-घर जाकर संक्रमित लोगों की पहचान करनी हो, मितानिनों ने हर बार अपनी उपयोगिता सिद्ध की है।

विश्व पटल पर सम्मान मिलने के बाद अब उन्हें अपनी कर्म स्थली में सम्मानित किए जाने की जरूरत है। सरकार उनकी मांगों पर संवेदनशीलता के साथ तत्परता से विचार करे। साथ ही लोगों को भी उनके प्रति अपने व्यवहार को बदलने की जरूरत है। अगली बार जब वे आपके द्वार पर आएं तो उन्हें अपने स्वास्थ्य की सही जानकारी के साथ आदर भी दें। प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं और व्यवस्था में मितानिनों की अहम भूमिका है। भविष्य में भी उनकी उपस्थिति प्रासंगिक बनी रहे और प्रदेश का स्वास्थ्य उत्तम बना रहे, इसके लिए मितानिन रूपी रीढ़ का स्वस्थ होना आवश्यक है।

Posted By: Pramod Sahu

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