रायपुर। विधानसभा से सर्वसम्मति से पारित होने के बाद आरक्षण संशोधन विधेयक को अब कानून बनने के लिए राज्यपाल के हस्ताक्षर का इंतजार है। शुक्रवार को दो दिवसीय विशेष सत्र के अंतिम दिन चर्चा के बाद मंत्रियों का दल रात में ही राज्यपाल अनुसुईया उइके के पास प्रस्ताव लेकर पहुंच गया। राज्यपाल हस्ताक्षर के पहले विधिक पहलुओं पर विमर्श कर रही हैं। इसके साथ ही प्रदेश में आदिवासियों के लिए 32 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत की व्यवस्था लागू हो जाएगी।

हालांकि उसके बाद भी संभावना यही है कि चुनावी वर्ष में राज्य की राजनीति में आरक्षण बड़ा मुद्दा बना रहेगा। दरअसल यह ऐसा विषय है जिसमें एक समय मेंे सबको संतुष्ट कर पाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। आरक्षण को लेकर राजनीतिक दलों में श्रेय लेने और दोषारोपण करने की होड़ मची ही रहेगी। हाई कोर्ट के निर्णय के कारण सितंबर महीने में जब आदिवासियों का आरक्षण कम हुआ तब भी पक्ष-विपक्ष इसका दोष एक-दूसरे पर मढ़ते रहे।

अब आरक्षण की सीमा का नए सिरे से निर्धारण कर दिया गया है तब भी सभी पक्ष संतुष्ट नहीं हैं। विपक्ष भी विधेयक मंें संशोधन चाहता था। उनका प्रस्ताव था कि अनुसूचित जातियों को 16 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।

विधानसभा में सरकार के पास दो तिहाई बहुमत है अतएव यह आवश्यक नहीं समझा गया कि विपक्ष के प्रस्ताव पर विचार कर लिया जाए। राज्य में आदिवासी वर्ग राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। विधानसभा की 90 मंे से 29 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। कई अन्य सीटों पर भी आदिवासी मतदाता प्रभावी भूमिका में हैं। यह आदिवासी वर्ग का दबाव ही था कि सरकार को विधानसभा का विश्ोष सत्र आयोजित करना पड़ा। नए विधेयक में आदिवासियों को 32 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों को 13 प्रतिशत, अन्य पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत तथा गरीब सवर्ण को चार प्रतिशत आरक्षण का प्रविधान किया गया है। 2012 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने आरक्षण में संशोधन किया था और आदिवासियों को 32 प्रतिशत आरक्षण दिया था।

2013 के चुनाव में भाजपा ने विजय हासिल की परंतु आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों में से 11 पर ही उसे विजय मिली। 18 सीटें कांग्रेस की झोली में चली गईं। भाजपा ने आदिवासी वर्ग का आरक्षण तो 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 कर दिया था परंतु अनुसूचित जातियों का आरक्षण 16 से घटाकर 12 कर दिया। इसके बावजूद उस चुनाव में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित दस में से नौ सीटों पर भाजपा को ही विजय मिली। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का वचन दिया था। कांग्रेस सरकार ने यह वचन पूरा किया है।

कांग्रेस कह रही है कि हम जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दे रहे हैं। इसके लिए क्वांटिफाइबल डाटा आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया गया है जो न्यायालय को भी मान्य होगा। वर्तमान व्यवस्था में अनुसूचित जाति और ईडब्ल्यूएस की उम्मीदें अवश्य आहत हुई हैं। आरक्षण पर पक्ष-विपक्ष की राजनीति के लिए यह बड़ा आधार होगा। मुश्किल यह है कि प्रदेश में गैर आरक्षित प्रतिभाओं के लिए मात्र 24 प्रतिशत स्थान बच गया है।

Posted By: Pramod Sahu

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