रायपुर। नई पेंशन योजना (एनपीएस) और पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंसते पेेंच से मुश्किलों के बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं। नई पेंशन योजना में तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अपेक्षानुकूल सुरक्षा की गारंटी नहीं मिल रही है।

लागू होने के समय से ही यह योजना विवाद का विषय बनी हुई है। बंगाल में एनपीएस लागू ही नहीं हुई। छत्तीसगढ़ में पुरानी पेंशन योजना लागू करने के पीछे राज्य सरकार का मकसद कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सुनिश्चित आय उपलब्ध कराना था। पुरानी पेंशन स्कीम में सेवानिवृत्ति के बाद वेतन का 50 फीसदी राशि पेंशन के तौर पर मिलती थी। तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा 2004 में लागू की गई एनपीएस से द्वितीय और उसके ऊपर की श्रेणी के कर्मचारियों को जरूर लाभ है परंतु 70 फीसद कर्मचारी उतना अंशदान नहीं कर पाते कि सेवानिवृत्ति के बाद सम्मानजनक पेंशन मिल सके।

यह योजना सरकारी के साथ-साथ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए लागू है जिसमें राज्य सरकार और कर्मचारी की तरफ से मूल वेतन का 10-10 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा गठित संस्थाओं में जमा कराया जाता है। एनपीएस में जाने वाला पैसा कर्मचारी रिटायरमेंट के वक्त पूरा नहीं निकाल सकता। उसे केवल फंड का 60 फीसदी ही प्राप्त होता है, बाकी का 40 फीसदी पैसा उसे फिर से केंद्र संस्थाओं के जरिए बाजार में लगाना पड़ता है। योजना लागू होने के समय से अंशदान में 10 फीसद की दर से लाभार्जन उच्च वर्ग के कर्मचारियों के लिए जरूर लाभकारी है।

प्रदेश सरकार ने कम वेतनमान वाले कर्मचारियों के हित में अप्रैल 2022 से पुरानी पेंशन योजना को लागू करने की घोषणा की है। तकनीकी कारणों से 2004 से 2022 तक 18 वर्षों में केंद्रीय संस्थाओं में जमा राज्य के हजारों करोड़ रुपये को प्राप्त करना सरल नहीं होगा। इसी संबंध में राजस्थान का अनुरोध तकनीकी कारणों से अस्वीकृत हो चुका है। वहां की सरकार ने भी पुरानी पेंशन योजना लागू करने के बाद केंद्र से एनएसपी की राशि मांगी थी। अब सवाल यह उठता है कि अगर यह सब सियासत का एक हिस्सा है तो इसका खामियाजा यहां के कर्मचारियों को भुगतने की स्थिति बन रही है।

ऐसे में इन हालात को और उलझाने के बजाय समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए। बेहतर हो कि केंद्र और राज्य सरकारें आपस में चर्चा कर इसका ऐसा समाधान तलाशने की कोशिश करें, जिससे किसी को भी नुकसान न उठाना पड़े। खून-पसीने की कमाई अटक जाने से विवाद ज्यादा ही बढ़ सकता है। संभव है, सुलह न होने पर अदालत की चौखट तक भी मामला पहुंच सकता है। वैसे भी कहा जाता है कि बातचीत से कठिन से भी कठिन समस्याओं का कोई न कोई रास्ता निकल ही आता है। ऐसे में राज्य और केंद्र सरकार, दोनों को इस दिशा में विचार कर जल्द से जल्द बातचीत करनी चाहिए।

Posted By: Ravindra Thengdi

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