रायपुर। दुर्ग जिले के अकोली गांव के सरपंच द्वारा अंतरजातीय विवाह करने वाले युवकों पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाना, पूरे गांव को भोजन कराने के लिए बाध्य करना, गांव में भीख मांगने का दंड देना और इनका साथ देने वाले पर भी एक लाख रुपये जुर्माना लगाने की घटना सभ्य समाज के लिए कलंक है।

पंचायत और सरपंच का यह कदम न केवल असामाजिक और असंवैधानिक है, बल्कि कुप्रथा को बढ़ावा देने वाला कृत्य है। सरपंच के विरुद्ध एक पीड़ित दंपती ने प्रशासन से शिकायत करने का साहस किया। उन्होंने इसकी शिकायत एसडीएम, कलेक्टर और एसपी तक से की, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। शासन और प्रशासन की उदासीनता का नतीजा यह हुआ कि सरपंच बेखौफ है और अंतरजातीय विवाह करने वाले युवक और उनके स्वजन खौफ में जीने को मजबूर हैं।

प्रशासन के मौन समर्थन के कारण सरपंच ने विरोध करने वाले पर तीन लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया और सामाजिक गतिविधियों से भी उन्हें अलग कर दिया। सरपंच ने जुर्माना वसूलने के लिए नौ सदस्यीय टीम तक बना रखी है। टीम के सदस्य अंतरजातीय विवाह करने वालों पर जुर्माना पटाने के लिए दबाव डालते हैं और धमकी भी देते हैं। सरपंच के इस कदम को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। अंतरजातीय विवाह करना न तो असंवैधानिक है और न ही असामाजिक।

बालिग युवक और युवती कानूनन अंतरजातीय विवाह कर सकते हैं। उन पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। वैसे भी समाज में संकीर्ण जाति व्यवस्था के बंधन से मुक्ति के लिए यह बहुत जरूरी है। हमारे संविधान ने किसी उुंचा या नीचा नहीं माना है, बल्कि सभी को समानता का अधिकार दिया है। जाति प्रथा के कारण जो जातियां पिछड़ गईं, उनके उत्थान की व्यवस्था की गई है। आरक्षण का प्रविधान भी इसी कड़ी का हिस्सा है। समाज में सभी सम्मान पाने के अधिकारी हैं। जातीय आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

भेदभाव करना किसी तरह से उचित नहीं है। इससे आपसी वैमनस्य बढ़ता है। भारतीय समाज में कोई जाति भी न तो श्रेष्ठ है और न कोई निम्न। जाति प्रथा की जड़ता समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। इसे अंतरजातीय विवाह से ही तोड़ा जा सकता है, मगर जब पंचायत और सरपंच ही इसमें रोड़ा अटकाने का काम करेंगे तो सामाजिक समरसता का सपना कैसे साकार होगा? इस मामले में सरपंच को अपने जिम्मेदार पद का ध्यान रखतेहुए ऐसा करने वाले युवक-युवतियों को प्रोत्साहित और सम्मानित करना चाहिए, मगर दुर्ग जिले की घटना श्ार्मनाक है।

इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि वे मौन हैं, जिनके उुपर जिले की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी है। शिकायत के बावजूद आरोपित सरपंच पर कार्रवाई न होना और पीड़ितों को न्याय न मिलना प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न लगाता है। जब प्रशासन ही सक्रिय नहीं होगा तो असामाजिक कृत्य करने वालों के हौसले बुलंद होंगे। आशा की जानी चाहिए कि प्रशासन और सरपंच अपनी जिम्मेदारी समझेंगे।

Posted By: Pramod Sahu

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