रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। राजधानी के शासकीय डेंटल कालेज में सामने आया रैगिंग का मामला चिंता बढ़ाने वाला है। कालेज की एंटी रैगिंग कमेटी ने जांच में दोषी पाए गए तीन छात्रों पर तात्कालिक कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से वर्ष 2001 में पूरे देश में प्रतिबंध के बाद भी यह गड़बड़ी नियंत्रित क्यों नहीं हो पा रही है?

पश्चिमी देशों की नकल करते हुए देश के शीर्ष कालेजों में शुरू हुई रैगिंग 1990 के दशक में देश के सरकारी इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेजों में आतंक का पर्याय बन चुकी थी। वरिष्ठ छात्रों का कनिष्ठ छात्रों से परिचय प्राप्त करने का यह विकृत तरीका बड़ी संख्या में आत्महत्या का कारण बनने लगा था। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से देश में रैगिंग कानूनी तौर पर पूर्ण रूप से प्रतिबंधित तो है, इसके बावजूद विभिन्न् कालेजों में रैगिंग की प्रक्रिया ढंके-छुपे रूप से आज भी जारी है।

नवागंतुक अपना भविष्य खराब होने के डर से अंतिम समय तक शिकायत करने से बचते हैं और वरिष्ठ इसी का लाभ उठाते हैं। इसे शिक्षित समाज के लिए कलंक कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस पर रोक के लिए शिक्षण संस्थानों में एंटी रैगिंग कमेटियां बनाई भी जाती हैं, लेकिन रैगिंग की ऐसी गलत परंपरा विकसित हो चुकी है कि शैक्षणिक जीवन और भविष्य बर्बाद होने के खतरे को भी छात्र नजरअंदाज करते हैं।

सरकारी मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में पढ़ने वाले निम्न और मध्यम आर्थिक आय वर्ग के प्रतिभावान युवा गलत संगत के कारण अपने माता-पिता के संघर्ष और उम्मीदों की किस तरह हत्या करते हैं, यह उन्हें कालेज से निकाले जाने और डिग्री से वंचित होने पर ही पता चलता है। ऐसा भी नहीं है कि रैगिंग पर रोक लगाने के लिए कालेज प्रबंधनों द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जाता। प्रवेश के दौरान ही छात्रों से शपथ-पत्र भरवाया जाता है कि रैगिंग जैसा कृत्य करने पर कालेज प्रबंधन द्वारा की गई किसी भी प्रकार की कार्रवाई उसे स्वीकार्य होगी। कहना गलत नहीं होगा कि रैगिंग के लिए संस्थान प्रबंधन की तरफ से सख्त निरीक्षण व्यवस्था की कमी भी जिम्मेदार होती है।

अधिकतर मामलों में पीड़ित छात्र दोषी छात्रों के विरुद्ध मामला दर्ज कराने का साहस नहीं जुटा पाते और गिनती के ही मामले सामने आते हैं। रैगिंग को जड़ से तभी समाप्त किया जा सकता है, जब शैक्षिक संस्थान, सरकारी प्राधिकरण, मीडिया और समाज मिलकर और गंभीरता से काम करें। जिला, राज्य और केंद्रीय स्तर पर रैगिंग विरोधी दस्तों और समितियों की स्थापना कर इस बुराई पर निरंतर दृष्टि रखी जाए।

रैगिंग की घटनाएं रोकने के लिए तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल की तरह छत्तीसगढ़ में भी कानून बनाया जाए। रैगिंग छात्रों द्वारा छात्रों के साथ किया जाने वाला अपराध है। अत: इसका उपाय भी काफी हद तक छात्रों द्वारा ही संभव है। छात्र समुदाय को इस अमानवीय कृत्य के विरुद्ध अपनी चेतना जागृत करनी चाहिए, जिससे छात्र इसका शिकार होने से बच सकें। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस कलंक को समाप्त करनेे के लिए सभी प्रतिभावना छात्र एकजुट होकर कार्य करेंगे।

Posted By: Pramod Sahu

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