रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। आज का दिन राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए अत्यंत दुखद है। वर्ष 2013 में आज ही के दिन बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सलियों ने हमला किया था, जिसमें कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ला समेत 32 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस घटना को बीते नौ साल हो गए हैं, लेकिन इसके पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है।

प्रदेश की राजनीति को झकझोर देने वाली इस घटना की जांच आज सियासी दांव-पेंच में उलझकर रह गई है। कांग्रेस जहां इस घटना की सच्चाई को सामने आने देने की राह में भाजपा पर अड़ंगा लगाने का आरोप लगा रही है, वहीं भाजपा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर नहीं रखने पर सवालिया निशान लगा रही है। भाजपा का यह भी आरोप है कि आयोग की जांच पूरी होने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने दूसरा जांच आयोग क्यों गठित कर दिया? कांग्रेस ने इस हमले को सुपारी किलिंग भी करार दे दिया था।

दरअसल झीरम कांड की पहली जांच छत्तीसगढ़ पुलिस ने शुरू की थी। जब मामले ने राजनीतिक रंग लेना शुरू किया और कांग्रेस ने सीबीआइ जांच की मांग की तो एनआइए को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इसके साथ ही तत्कालीन भाजपा सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का भी गठन कर दिया था। वर्तमान सरकार ने जांच में नए बिंदुओं को शामिल करते हुए न्यायिक जांच आयोग का कार्यकाल बढ़ाया और नए सदस्यों की नियुक्ति की।

एनआइए से दस्तावेज नहीं मिलने के कारण एसआइटी जांच भी शुरू नहीं हो पाई है। किसी भी राजनीतिक दल को यह कहने में जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए कि इस घटना ने प्रदेश की राजनीति को जो क्षति पहुंचाई है, उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। सरकारें किसी की भी हों, छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का खात्मा होना ही चाहिए। वर्तमान में नक्सलियों को कमजोर करने में काफी सफलता भी मिल रही है। बावजूद इसके अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसके पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। इसके पीछे जो भी जिम्मेदार हों, उनका चेहरा सामने आना चाहिए। उन्हें सजा मिलनी चाहिए। जनता के सामने यह संदेश जाना चाहिए कि कानून की गिरफ्त से बाहर कोई भी नहीं है। आज के दिन सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को यह संकल्प लेने की जरूरत है कि प्रदेश के माथे पर लगे इस कलंक को हर हाल में मिटाया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि भूपेश सरकार पीड़ितों को न्याय दिलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगी। भाजपा भी एक संवेदनशील विपक्ष की भूमिका निभाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगी। पीड़ितों को भी अपनी सरकार और संवैधानिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा रखना चाहिए कि देर से ही सही, उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।

Posted By: Abhishek Rai

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