रायपुर (निप्र)। नक्सलियों ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया है। जंगल से आए इस फरमान में नक्सलियों ने पंचायती राज व्यवस्था और ग्राम सभाओं के औचित्य पर सवाल खड़े किए गए हैं। बस्तर में सक्रिय नक्सली संगठन के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी का कहना है कि जब ग्रामसभाओं की अनुमति के बिना ही जमीन अधिग्रहण सहित अन्य कार्य किए जा रहे हैं, तो फिर इसका औचित्य क्या है?

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी के हवाले से जारी एक लिखित बयान में कहा गया है कि पंचायत राज व्यवस्था दरअसल शोषक- शासक वर्गों के लुटेरे तंत्र को गांव स्तर तक मजबूत करने के लिए है। इन चुनावों से आम जनता की जिंदगियों में कोई खास बदलाव नहीं आने वाला है। गुड्सा ने कहा है कि आदिवासी इलाकों में 'पेसा' कानून लागू किया गया है। ग्रामसभाओं को कहने के लिए तो विशेष अधिकार दिए गए थे, लेकिन उनकी अनुमति के बिना ही आदिवासियों की जमीन अधिगृहीत की जा रही है। आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य का हाल बेहाल है। विकास योजनाओं का बड़ा हिस्सा, सड़क, पुल- पुलियों, मोबाइल टावरों, थाना, कैंपों के लिए खर्च किया जा रहा है। इन योजनाओं के नाम पर सरपंच, सचिव एवं अधिकारी व नेता अपनी जेब भरते हैं।

माड़ में एक लाख एकड़ जमीन का अधिग्रहण

गुड्सा ने अपने बयान में कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार माड़ क्षेत्र की करीब एक लाख एकड़ जमीन जबरन अधिगृहीत करने की तैयारी में है। आदिवासियों की इस जमीन को बड़े औद्योगिक घरानों के संयंत्रों, मेंढकी, बोधघाट बहुउद्देशीय बांध परियोजनाओं, संसाधनों की सस्ती लूट व सशस्त्र बलों की सरल आवाजाही के लिए रावघाट रेल लाइन, हवाई अड्डों, हेलिपैड्स, वायुसैनिक अड्डों, माड़ पर सैनिक प्रशिक्षण शाला आदि के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

कोयला मजदूरों का समर्थन

सन 1977 के बाद पहली बार देश में हुए कोयला मजदूरों की हड़ताल का समर्थन करते हुए नक्सली प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने कहा है कि कोयला खदानों के निजीकरण का खतरा अभी टला नहीं है। गुड्सा के अनुसार भले ही सरकार ने निजीकरण न करने का आश्वासन दिया है, लेकिन केन्द्र की सरकार जिस तरह से काम कर रही है, उसे देखते हुए मजदूरों को सतर्क रहने की जरूरत है।

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