वेदप्रकाश त्रिपाठी। नईदुनिया, रायपुर। बस्तर के हाट-बाजार में साल में बमुश्किल तीन महीने ही बिकने वाले बरमसी पताल (छोटा देसी टमाटर) की मांग महानगरों में खूब रहती है। इसकी चटनी काफी स्वादिष्ट होती है। बाजार में इन दिनों बिक रहे टमाटर और बरमसी पताल के स्वाद में जमीन-आसमान का अंतर होता है। यही वजह है कि सीजन आने पर लोग इसकी तलाश में रहते हैं, क्योंकि बाजार में आते ही कोचिए इसे फौरन खरीद लेते हैं।

आदिवासी इलाकों के ग्रामीण टोकरियों में इसे लेकर हाट-बाजार पहुंचते हैं। वहां इंतजार में बैठै कोचिये सभी से औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। फिर आर्डर के हिसाब से उसे गंतव्य के लिए रवाना कर देते हैं। शहरी इलाकों में इस टमाटर की काफी मांग रहती है। ग्रामीण इसे बरमसी पताल भले ही कहते हैं, लेकिन यह बारहों माह नहीं मिलता। लिहाजा फसल आने और खत्म होते तक बाजार में इसकी कीमत नीचे कभी नहीं आती।

बरमसी पताल हर साल नवंबर से जनवरी महीने में ही बिकने आता है। इसकी मात्रा कम होती है जबकि मांग अधिक। बस्तर के हाट-बाजार में हाईब्रिड टमाटर की दर किलो के हिसाब से तय होती है, जबकि बरमसी पताल दोने में भरकर बेचा जाता है। इसकी कीमत भी दोना के हिसाब से ही तय रहती है। कोचियों के मुताबिक इसका उत्पादन सालभर नहीं होने के कारण ही यह जब बाजार में आता है तो मांग काफी रहती है। चूंकि यह ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, इसीलिए इसका व्यावसायिक उत्पादन भी नहीं किया जाता। विशेषकर ग्रामीण अंचल की बाड़ियों में इसका ही उत्पादन लिया जाता है। हाईब्रिड टमाटर की अपेक्षा दो से तीन गुना इसकी कीमत मिलती है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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