Raipur Religious News: रायपुर। छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में श्रीऋषभदेव मंदिर सदरबाजार में साध्वी शुभंकरा ने कहा कि कर्म मिमांशा सूत्र के माध्यम से हम कर्म के मर्म को समझने की कोशिश कर रहे हैं। कर्मबंध और कर्म बंध का अनुबंध दोनों ही अच्छे नहीं हैं। यह वर्तमान काल हमारे द्वारा पूर्व में बोए हुए कर्म बीजों का ही प्रतिफल है। आज जो हम सुख या दुख की अनुभूति कर रहे हैं, वह सब हमारे ही कर्मफल हैं।

यदि सांसारिक जीवन की विवशता में सूक्ष्म पाप कर्म करने पड़ रहे हैं तो उन्हें पश्चाताप् के साथ करें और पुण्य कर्म जब भी करें, उन्हें मन के आनंद और अनुमोदना से करें। दुनिया वालों के दोषों को देखने से पहले हम स्वयं का अवलोकन करें। अपने-आपको टटोलें कि मैं कितने पानी में हूं। क्योंकि यह शाश्वत सत्य है कि जैसा हमने बोया है वैसा ही हमें मिल रहा है और आगे भी मिलने वाला है।

साध्वीवर्या ने आगे कहा कि कर्म बंध के बिना सशरीरी जीवन जीना, यह टेढ़ी खीर जरूर है किन्तु कर्म के मर्म को समझ जाएं तो निष्पाप, निष्कलंक जीवन जीना सहज हो जाता है। हमारी बहुत छोटी-छोटी सोच से ही अनंत का अनुबंध होता रहता है, इसीलिए ज्ञानीजनों ने कहा कि सांसारिक गृहस्थ जीवन के कर्म करें किन्तु उसके साथ आसक्त भावों से जुड़े नहीं, केवल ज्ञाता-दृष्टा बनकर जीवन जीएं।

संसार के दुखों से मुक्ति पाने जीवन की वास्तविकता स्वीकारें

दिगंबर जैन मंदिर सन्मति नगर फाफाडीह में पर्वराज पर्यूषण पर्व के 9वें दिन शनिवार को उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना हुई। शांतिधारा का सौभाग्य महावीर प्रसाद,राजकुमार बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ। दोपहर में तत्वार्थ सूत्र के 9वें अध्याय का वाचन हुआ। शाम को प्रतिक्रमण, आरती, प्रवचन के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।

ब्रह्मचारी चक्रेश भैय्या ने उत्तम आकिंचन धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि आकिंचन का अर्थ होता है आत्मा। जिसके पास कुछ भी नहीं वह आकिंचन कहलाता है। जो कुछ हमने पाया और कमाया है वह हमारी आत्मा का कुछ नहीं है। आत्मा का कुछ नहीं होने से आत्मा ही आकिंचन धर्म स्वरूपी है। हमारे जीवन की यही वास्तविकता और सच्चाई है। यदि हम इस वास्तविकता को स्वीकार कर लें, तो जो हम वस्तुओं को पाने की लालसा में संसार के दुख पाते हैं, उस दुख से हमें मुक्ति मिल जाएगी।

आकिंचन धर्म हमें हमारी वास्तविकता का दर्शन कराता है। पद, प्रतिष्ठा और धन के पीछे भागना सब व्यर्थ है। हमारा कुछ भी नहीं है, हम न ही कुछ लाए थे और न ही कुछ ले जाएंगे। अपने जीवन की वास्तविकता को स्वीकार करना ही आत्मा का स्वरूप है,यही आकिंचन धर्म का उपदेश है।

Posted By: Kadir Khan

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