रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। कांग्रेस के चिंतन शिविर में एक तस्वीर ने पूरे छत्तीसगढ़ का ध्यान खींचा। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के बगल में राष्ट्रीय सचिव राजेश तिवारी बैठे नजर आए। जैसे ही यह तस्वीर सामने आई, इंटरनेट मीडिया पर जमकर शेयर हुई। छत्तीसगढ़ के सियासी पंडित इस तस्वीर के मायने तलाशने लगे। कुछ लोगों ने चिंता जताई कि आखिर यह कैसे हो गया? कुछ लोगों ने इसे राज्यसभा चुनाव से भी जोड़ा। कुछ ने उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रभारी बनने से जोड़ा, लेकिन सबकी चिंता इस बात को लेकर थी कि प्रदेश में कांग्रेस का एक और गुट बढ़ गया। अब तक तीन दिशाओं में चल रहे संगठन को चौथा रास्ता दिखाई देने लगा। हालांकि कांग्रेस के दिग्गजों की मानें तो तिवारी जिस तरह की राजनीति करते हैं, उसमें यह संभव नहीं है। कभी बस्तर की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताजी अब केंद्रीय स्तर पर दम दिखा रहे हैं।

कमजोर बूथ खोजने में 'टिकट" का रोड़ा

विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा ने सांसदों और विधायकों को कमजोर बूथ की तलाश का जिम्मा सौंपा था। 15 दिन तक चले अभियान में दस दिन, दस घंटे बूथ में देने थे। लेकिन कई विधायक और सांसद इस टास्क को पूरा ही नहीं कर पाए। पार्टी की कोशिश है कि संगठन को मजबूत करके सत्ता में वापसी करे, लेकिन पदाधिकारियों की अकर्मण्यता ने इस अभियान की रफ्तार को ठंडा कर दिया। अधिकांश नेता खानापूर्ति करते नजर आए। जबकि कुछ नेताओं ने इस अवसर का भरपूर उपयोग किया। दरअसल, ये वहीं नेता हैं, जिनको उम्मीद है कि अगले चुनाव में उनको पार्टी टिकट देगी। कई सांसद तो निराशा भरे अंदाज में कार्यक्रम में शामिल हुए। एक सांसद ने कहा, टिकट का भरोसा नहीं, ऐसे में भीषण गर्मी में पसीना बहाने से क्या फायदा? केंद्रीय संगठन जान ले कि बूथ तक पहुंचे हैं, उतना ही काम किया जाए।

चुनावी मुद्दा बना हसदेव

हसदेव अरण्य में पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे आदिवासियों को अब राजनीतिक दलों का साथ मिलने लगा है। सत्ता में आने से पहले कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने हसदेव के आदिवासियों से जल, जंगल, जमीन बचाने का वादा किया था। सरकार ने पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार के पाले में डाल दिया है। भाजपा और कांग्रेस के नेता इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हैं। अब तक देश और प्रदेश के अलग-अलग आदिवासी संगठन हसदेव के पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे हैं, लेकिन अब आम आदमी पार्टी समर्थन में उतरी है। आप का प्रदेश में भले ही जनाधार कमजोर है, लेकिन चुनाव से पहले वह इसे बड़ा मुद्दा बनाने की फिराक में है। आने वाले समय में भले ही कोई परिणाम आए या न आए, हसदेव को चुनावी मुद्दा बनाने की कसरत जरूर शुरू हो गई है। देखिए, अब रणनीतिकार क्या करते हैं?

कर्मचारियों की पेंशन पर मशक्कत

प्रदेश में कर्मचारियों को सौगात देते हुए सरकार ने पुरानी पेंशन बहाल करने की घोषणा की। सरकार की घोषणा से कर्मचारियों में तो उत्साह का माहौल है, लेकिन पैसे को लेकर सरकार को मशक्कत करनी पड़ रही है। केंद्र सरकार को पत्र लिखा गया है। केंद्र पर पहले ही करोड़ों स्र्पये की लेनदारी निकल रही है। ऐसे में कर्मचारियों के पैसे को लेकर केंद्र का क्या रुख रहेगा, यह देखना होगा। वैसे भी राजस्थन सरकार को केंद्र ने पैसा देने से पहले ही इंकार कर दिया है। ऐसे में यहां उम्मीद कम ही नजर आ रही है, लेकिन सरकार कोई कोर कसर छोड़ने को तैयार नहीं है। प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो सरकार ने जैसे धान से एथेनाल बनाने की अनुमति के लिए संघर्ष किया और तीन साल बार परिणाम आने लगे, वैसे ही पेंशन के लिए संघर्ष को तैयार है। ठीक भी है, कर्मचारी सरकार की रीढ़ जो हैं।

Posted By: Abhishek Rai

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