रायपुर। राजधानी का रामकुंड क्षेत्र धर्म के नाम से चर्चित रहा है। इसके रामकुंड नाम होने की भी रोचक कहानी है। यहां जीई रोड पर रामकुंड तिराहे पर सड़क से उतरते ही 50 कदम दूर लक्ष्मीनारायण मंदिर स्थित है। इस मंदिर का सीधा संबंध अयोध्या से है। मध्यकाल में धर्म प्रचार के लिए साधु संत समय समय पर रायपुर आते रहते थे। उनमें से कई रायपुर में ही बस गए थे।

उन्हीं में से एक थे साल 1880 में अयोध्या के हनुमान गढ़ी से आए संत बलदेव दास जी। आज जहां मंदिर है वहां पर वे कुटिया बनाकर साधना में लीन रहते थे। अपनी कुटिया में उन्होंने एक कुंड बनाया था। जिसे सिद्ध रामकुंड भी कहा जाता था। आसपास जंगल हुआ करता था। धीरे धीरे उनकी ख्याति फैलने लगी। उनके दर्शन के लिए दूर दूर से लोग आते थे।

साल 1892 में दुर्ग जिले के सुरडुंग गांव के मालगुजार ठाकुर अर्जुन सिंह उनसे आशीर्वाद लेने पहुंचे थे। ठाकुर अर्जुन सिंह ने तीन शादियां की थी। किंतु वे नि:संतान थे। उन्होंने बलदेव दास जी से पुत्र रत्न की कामना की। बलदेव दास जी के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। इस पर उन्होंने वहां मंदिर का निर्माण कराया। बताते हैं कि इस मंदिर से एक सुरंग निकलकर आमातालाब तक जाती है।

मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए पहुंचे थे लाल मुंह के बंदर

नवनिर्मित मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की बारी आई तो बलदेव दास जी ने अयोध्या जाकर वहां के साधु-संतों को आमंत्रित किया। साथ ही परंपरा अनुसार उन्होंने हनुमान जी को भी रायपुर आकर आशीर्वाद देने का आह्वान किया। जिस दिन प्राण प्रतिष्ठा की गई और संतों को भोजन कराने की तैयारी की जा रही थी, उसी समय अचानक लाल मुंह के बंदर वहां पहुंचकर एक क्रम में बैठ गए। तब सबसे पहले उन्हें भोज कराया गया।

जब तक आयोजन चलता रहा प्रतिदिन भोज के समय बंदर आ जाते थे। उन्हें नियमित रूप से भोज भी दिया गया। बताते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा के अंतिम दिन रात में मालपुआ तथा अन्य व्यंजन बनाने के लिए घी कम पड़ गया। तब एक तपस्वी के कहने पर आमातालाब से पानी लाकर बर्तन में डाला गया तो आश्चर्यजनक ढंग से पानी घी में बदल गया। अगले दिन आमातालाब में निकाले गए पानी के बदले बाजार से तीन पीपा घी डाल दिया गया। बुजुर्ग याद करते हुए बताते हैं कि तालाब के एक हिस्से में घी की परत दिखाई भी पड़ती थी।

Posted By: Pramod Sahu

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