रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

पचपन साल की रेणुका सोनवाने का जीवन अब मवेशियों की सेवा के लिए समर्पित हैं। सुबह होते ही वे मवेशियों की सेवा करने गोशाला में पहुंच जाती हैं। पिछले 18 वर्षों से इस कार्य में जुटी रेणुका का कहना है कि मवेशियों में खासकर गायों और कुत्तों की देखरेख कोई नहीं करता है। इस वजह से आए दिन हादसों में वे बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं। बस यही एक बड़ी वजह रेणुका समेत उनके परिवार वालों सेवा के लिए आगे लाई। ऐसे जानवरों का न सिर्फ अपने बच्चों की तरह इलाज कर रहे हैं, बल्कि कुछ दिन में इन्हें तंदुरुस्त भी बना रहे हैं। रेणुका ने लगभग 60 मवेशी और कुत्तों का इलाज कर उन्हें ठीक किया। वे जानवर उन्हें छोड़कर नहीं जा रहे हैं। इस वजह से उनका पूरा परिवार मवेशियों की सेवा में जुट गया है।

पेंशन की राशि सेवा में खर्च

वहीं आसपास के लोगों की मानें तो रेणुका के पति की पेंशन मवेशियों की सेवा में खर्च हो रही है और उनका बेटा भी माता-पिता की इस नेक पहल में साथ दे रहा है। रेणुका सुबह छह बजे उठती हैं। घरेलू काम से पहले वे इन पशुओं के लिए बनाई गई गोशाला में आ जाती हैं। वे साफ-सफाई, खाना-दवा और मलहम-पट्टी के बाद रात नौ बजे अपने घर लौटती हैं। पिछले 18 साल से यही चला आ रहा है। मौसम, सुख-दुख और बीमारी जैसी कोई बाधा उन्हें एक दिन भी यहां आने से नहीं रोक पाई है। उनकी पहल और समर्पण की बातें इस तरह फैली हैं कि राजधानी के तमाम वेटनरी डॉक्टर और पशु-प्रेमी भी उनके साथ जुड़ गए हैं।

सामाजिक संस्थान भी जुड़े

हादसे में घायल किसी भी पशु को वे उनके पास छोड़ जाते हैं। रेणुका बताती हैं कि ऐसे-ऐसे जानवर स्वस्थ हो चुके हैं, जिनके बचने की उम्मीद ही नहीं थी। रेणुका 55 गाय-बैल और 40 कुत्तों की देखभाल कर रही हैं। कई मौके ऐसे आए, जब घायल पशु लाए गए, पर इलाज के पैसे नहीं थे। ऐसे में कुछ वेटनरी डॉक्टर व सामाजिक संस्थान जुड़ गए।

एक हादसे ने बदली जिंदगी

रेणुका बताती हैं कि उन्हें पालतू जानवरों से शुरू से लगाव रहा है। वे 16 साल पहले भोपाल में रहती थीं। घर में चार लोग हैं, लेकिन 10 का खाना बनता था। उनके पति बाकी भोजन का पैकेट बनाते थे। फिर ये पैकेट मोहल्ले के बेसहारा पशुओं को दे आते थे। छत्तीसगढ़ बनने के बाद वे यहां आ गए और कांशीराम नगर कॉलोनी में उन्हें सरकारी क्वार्टर मिला।

एक रात उनके सामने रिंग रोड पर एक तेज रफ्तार ट्रक एक गाय और बछड़े को बुरी तरह टक्कर मारकर निकल गया। उस समय तो वे कुछ नहीं कर पाईं, लेकिन इसके बाद घायल पशुओं के इलाज और देखरेख खुद करने की ठानी। उन्होंने सरकारी क्वार्टर में यह काम शुरू किया। कुछ दिन बाद घर के सामने भोजन के लिए गाय और कुत्तों का झुंड लगने लगा तो लोगों ने विरोध किया। इस परिवार ने किराये का मकान लिया और कॉलोनी छोड़ दी, लेकिन घायल पशुओं की देखरेख अब भी जारी है।