रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। क्या हमारा मन इतना कमजोर है कि जरूरत की चीजें वह ग्रहण नहीं कर सकता और अनावश्यक हो उसे ग्रहण करके रखता है। इसके चलते व्यक्ति के दिमाग में कचरा ही कचरा भरा होता है। छोटी सी छोटी साधना के लिए हमें छोटे-छोटे सामान की आवश्यकता पड़ती है। हमेशा बड़े काम की शुरुआत छोटे रूप में करना चाहिए। एक दिन वह छोटा काम भी बड़ा हो जाता है। यह संदेश न्यू राजेंद्र नगर में साध्वी स्नेहयशा ने दिया।

जीवन चक्र को समझें, मन स्थिर रखें

साध्वी ने एक प्रसंग में कहा कि एक बार एक वैश्या को अमर फल मिल जाता है, उसे खाकर वह अमर हो सकती थी लेकिन उसने सोचा कि मैं तो बहुत बड़े पाप का काम करती हूं। यह फल अगर मैं अपने न्यायप्रिय साम्राज्य के राजा को दे दूं तो वे लंबे समय तक सेवा करेंगे। वह राजा को फल दे देती है। राजा सोचता है कि मैं अमर हो जाऊं तो रानी का क्या होगा। वह उस फल को रानी को दे देता है। रानी का मन महावत की ओर होता है। वह सोचती है कि यह फल मैं महावत को दे दूं तो महावत हमेशा मेरे साथ रहेगा। ऐसा सोचकर वह फल महावत को दे देती है। फल प्राप्त कर महावत सोचता है कि मैं तो वैश्या को चाहता हूं, अगर वह नहीं रहेगी तो मैं जी कर क्या करूंगा। वह वैश्या को फल दे देता है। वैश्या फिर से उसी सोच के साथ वह फल राजा के पास लेकर जाती है। राजा जान लेता है कि मैंने तो यह फल रानी को दिया था और वह अपने जीवन चक्र को समझ जाता है। कुछ ऐसे ही हमारे जीवन में चलता रहता है। जिस चक्र को अगर हम जान जाए तो हमें हमारा जीवन समझ में आ जाएगा। इसलिए जीवन चक्र की उलझनों के बजाय हमें हमारे मन को स्थिर रखने की आवश्यकता है।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close