रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। धर्म हमेशा सुई-धागे की भांति आपस में जो टूटे हुए हैं उन्हें जोड़ने का काम करता है। आदमी को धर्म के नाम पर हमेशा उदार रहना चाहिए, अपने नजरिए को हमेशा बड़ा रखना चाहिए। क्योंकि धर्म हमें पहली सीख यही देता है कि खुद भी सुख से जियो और दूसरों को भी सुख से जीने दो।" यह संदेश आउटडोर स्टेडियम में संत ललितप्रभ महाराज ने दिए।

'नए युग में धर्म का प्रेक्टिकल स्वरूप" विषय पर कहा कि धर्म हमें यही सीख देता है कि जहां इंसान-इंसान आपस में हिल-मिलकर रहते हों, बैर-विरोध न हो, एक-दूसरे से ईर्ष्या न करते हों वहीं से धर्म की शुरुआत होती है। धर्म इंसान को कभी तोड़ने-अलग करने, आपस में लड़ने का पाठ नहीं पढ़ाता। धर्म तो लोगों को जोड़ने का पाठ पढ़ाता है।

जो अपने लिए चाहते हो, वही सबके लिए चाहो

आदमी केवल अपने लिए ही जीने की व्यवस्था न करे, अपितु दूसरे भी जीवन जी सकें इसके लिए अच्छी व्यवस्था भी दो। जो तुम अपने लिए चाहते हो, वही सबके के लिए चाहो। जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वो किसी के लिए भी मत चाहो। अपनी आलोचना नहीं सुनना चाहते तो दूसरों की आलोचना मत करो। आप अपने धन कभी चोरी होने देना नहीं चाहते तो दूसरों के धन को मत हड़पो। जब आप कहते हैं कि भगवान तू मेरा भला कर तब भगवान सात जन्म में नहीं करता और जब यह कहते हैं कि भगवान तू सबका भला कर तो भलाई की शुरुआत वो आपसे ही करता है।

क्यों लगाते हैं माथे पर चंदन

अनेक लोग ललाट पर चंदन का तिलक लगाते हैं, इसीलिए नहीं कि केवल माथा ठंडा रहे। ललाट पर तिलक लगाना यह केवल परंपरा का ही प्रतीक नहीं, ये इस बात का प्रतीक है कि हे प्रभु मैं आपकी पूजा बाद में कर रहा हूं, उससे पहले मैं आपकी साक्षी से अपने ललाट पर तिलक धारण कर यह संकल्प ले रहा हूं कि हे प्रभु आपने जो धर्म का मार्ग दिया है मैं उसका पालन मैं केवल मंदिर में ही नहीं अपितु सर्वत्र करता रहूंगा। हम मंदिर में घंटा इसीलिए बजाते हैं ताकि हम अपनी सोई हुई चेतना को जगा सकें।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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