रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। शाम्यतिलक विजय महाराज ने चातुर्मास के दौरान आयोजित सत्संग में गुरु और जैन संप्रदाय को लेकर विचार व्यक्त किए। श्रीहीरसूरी भवन में उन्होंने श्रावक जीवन के 36 कर्तव्यों पर चल रही प्रवचन माला के अंतर्गत बताया कि जैन शासन गुणों पर आधारित है। इसमें व्यक्ति विशेष के आधार पर कोई निर्णय नहीं किया जाता। जब जिस व्यक्ति से सभी का हित हो, उस समय उसे महत्व दिया जाता है। इसलिए जैन शासन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान गुरु का होता है, लेकिन गुरु का चयन करते समय व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि गुणों की महत्ता होती है।

पूज्य श्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि हम रात में बस में सफर करते हैं तो इस सफर के दौरान प्राय: सारे यात्री सो जाते हैं, लेकिन वाहन चालक पूरी यात्रा में जागता रहता है। उसे एक मिनट की झपकी लेने की भी गुंजाइश नहीं होती है। उसी तरह श्रावक के जीवन में भी ऐसा गुरु होना चाहिए, जिसके जीवन में गलतियों की गुंजाइश न हो। वह सदैव पत्मात्मा की आज्ञा का पालन करने वाला और सभी का हित चाहने वाला होना चाहिए। श्रीहीरसूरी भवन में 45 दिवसीय आगम तप का 25वां दिवस था। आज के एकासना के लाभार्थी शांतिलाल, सुरेंद्र कुमार, सरवेश कुमार पोरवाल परिवार हैं और संपूर्ण चातुर्मास के सह मुख्य लाभार्थी देवराज, भरत कुमार, प्रवीण कुमार, विनोद कुमार, प्रमोद कुमार सोनीगरा परिवार है तथा गुरूवार को कुल 70 तपस्वियों ने एकासना किया।

ज्ञान के निधान है ऋषि: डा. इंदुभवानंद

जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा स्थापित संस्कृत विद्यालय के समस्त छात्रों, आचार्यों, पुरोहितों और वैदिक विद्वानों ने महादेव घाट जाकर श्रावणी उपाकर्म किया। हिमाद्रि संकल्प, दसविध स्नान, अपामार्ग मार्जन, दूर्वामार्जन, कुशमार्जन आदि के द्वारा वर्ष भर के पापों का प्रायश्चित किया। अंत में डा. इंदुभवानंद ने ऋषि पूजन कर बताया कि ऋषियों का पूजन करने से वंश में अज्ञानता (मूर्खता) का प्रभाव नहीं होता है। ऋषि दोष की निवृत्ति होती है। परिवार के लोग बौद्धिक और समझदार होते हैं। इसे ऋषियों का कृपा प्रसाद माना जाता है। ऋषि मंत्र के दृष्टा होते हैं, अत: ऋषियों का पूजन हमको अवश्य करना चाहिए। जीर्ण जनेऊ का त्याग करके ब्राह्मण, जटा धन तथा चारों वेदों का पाठ भी किया गया।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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