रायपुर नईदुनिया प्रतिनिधि

24 तीर्थंकर जब तक कैवल्य ज्ञान को प्राप्त नहीं करते हैं, छद्मस्थ अवस्था में रहते हैं, तब तक वे किसी को उपदेश नहीं देते हैं, वे अपनी साधना में लीन रहते हैं। यानी मौन साधना का कितना बड़ा महात्म्य है। मौन में सिद्धि है, जबकि बोलने में केवल प्रसिद्धि है। सिद्धि व समृद्धि का द्योतक, पूर्णता का प्रदायक व गंभीरता का ज्ञायक भी मौन ही है। यह संदेश साध्वी चंदनबाला ने अपनी लेखनी के माध्यम से दिया।

साध्वीश्री ने कहा कि भगवान महावीर ने साढ़े 12 वर्ष तक मौन रहकर संपूर्णता को प्राप्त किया। मौन साधना का संदेश है, सफलता का रहस्य है तो व्यवस्था का परिचायक भी है। जीवन के शिलालेख पर अंकित प्रभावशाली यदि कोई मंत्र या सिद्धि का तंत्र है तो वह है मौन।

साध्वीश्री ने कहा कि जिव्हा जिसकी रुकी, दुनिया उसको झुकी। ज्ञानी हृदय से व नयनों से बात करते हैं। मौन सदैव वचन को सुरक्षा कवच प्रदान करता है। व्यक्ति को अन्तर्दृष्टि की ओर आगे बढ़ाता है। वाणी पर विजय प्राप्त करवाना और समाधि का मंत्र देना, दोनों मौन पर आधारित है। मौन में आंतरिक प्रसन्नाता है, प्रशंसा में बाहरी दिखावा है। जिसकी जिव्हा जहरी, दुनिया उसकी बैरी, हमें वचनसिद्धि प्राप्त करना है तो अनावश्यक व अनर्गल शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कितने ही झगड़े तो मौन से निपट जाते हैं। हमारी आत्मा का स्वभाव भी शांति-क्षमा-सहिष्णुता है। ये तीनों गुण मौन से ही संभव है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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