रायपुर। राजधानी रायपुर में कंकाली तालाब शहर के बीचोबीच स्थित है। इस तालाब का निर्माण नागा साधुओं द्वारा 650 साल पहले करवाया गया था। तालाब के बीच में छोटा-सा मंदिर बनवाकर शिवलिंग की स्थापना की। इसके बाद ऐसा चमत्कार हुआ कि अचानक एक दिन धरती से पानी की धारा फूट पड़ी और तालाब लबालब भर गया। सदियों से आज तक मंदिर तालाब के बीच डूबा है, जिसके चलते भक्तगण शिवलिंग के दर्शन नहीं कर पाते। इस तालाब की खोदाई में कंकाल मिले थे, इसलिए इसका नाम कंकाली तालाब पड़ा। आइए आपको कंकाली तालाब के रोचक जानकारी से रू-ब-रू करा रहे हैं।

कंकाली तालाब की मान्यता है कि इसमें डुबकी लगाने से त्वचा संबंधी रोग दूर हो जाते हैं। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। हो सकता है कि तालाब में कुछ ऐसे खनिज तत्व मौजूद हों, जिनसे त्वचा की बीमारियां ठीक हो जाती हों। हालांकि डाक्टरों की मानें तो चिकित्सकीय इलाज ही बेहतर विकल्प होता है। कंकाली तालाब की पुरानी मान्यता के चलते यहां डुबकी लगाने के लिए प्रदेश ही नहीं, देश भर से लोग पहुंचते हैं।

ब्राह्मणपारा की पार्षद सरिता दुबे के अनुसारपूर्वजों ने बताया है कि सबसे पहले 1965 में तालाब की सफाई करवाई गई थी। तब मुहल्ले के लोगों ने पत्थर के शिवलिंग के पहली बार दर्शन किए। तालाब फिर भर गया। इसके बाद 1975, 1999 और फिर 2013 में पुन: तालाब की सफाई की गई। इस तरह अब तक मात्र चार बार आसपास के हजारों लोगों ने शिवलिंग के दर्शन किए थे।

वर्तमान में तालाब लबालब भरा है और शंकर भगवान का मंदिर का गुंबद ही दिखाई दे रहा है। इस तालाब के बीच में बना 20 फुट ऊंचा मंदिर पूरी तरह से डूबा रहता है, इसलिए तालाब की गहराई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है, लेकिन वहां के रहवासियों का कहना है कि तालाब की गहराई कम से कम 30 फुट होगी। उन्होंने बताया कि तालाब के सुंदरीकरण का काम चल रहा है।

तालाब में सुरंग से आता है पानी

बुजुर्गाें ने बताया है कि कंकाली तालाब के भीतर सुरंग बनी हुई है। इस सुरंग के रास्ते से तालाब से दो-तीन किलोमीटर दूर महाराजबंध तालाब, नरैया तालाब और बूढ़ातालाब तक पानी पहुंचता है। कुछ ही दूर प्रसिद्ध महामाया मंदिर की बावली भी कंकाली तालाब से जुड़ी हुई है। इस तालाब को लेकर ऐसी मान्यता है कि किसी के शरीर में खुजली हो या चर्म रोग के कारण कोई परेशान हो तो तालाब में डुबकी लगाने से राहत मिलती है।

नागा साधुओं ने की मठ की स्थापना

मां कंकाली मंदिर में कई पीढ़ी से पूजा कर रहे पुजारी परिवार के वंशज बताते हैं कि 700 साल पहले आजाद चौक, ब्राह्मणपारा के समीप नागा साधुओं ने मठ की स्थापना की थी। वे मां कंकाली के परम भक्त थे। महंत कृपाल गिरी महाराज को मां कंकाली ने स्वप्न में दर्शन देकर कुछ ही दूर मंदिर निर्माण करने की आज्ञा दी। लगभग 650 साल पहले मंदिर का निर्माण पूरा हुआ और मां कंकाली की प्रतिमा को मठ से स्थानांतरित करके मंदिर में स्थापित किया गया।

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