आकाश शुक्ला रायपुर। अंधाधुंध गोलियों की बौछारें, चारों तरफ सिर्फ चीखें, खून और लाशें। शरीर पर गोली खाने के बाद मैंने और मेरे साथियों को जान बचाने के लिए घंटों गाड़ी छिपना पड़ा। 25 मई, 2013 को झीरम घाटी में हुए देश के सबसे बड़े नक्सली नरसंहार का वह काला दिन यादकर प्रदेश कांग्रेस के सचिव शिव सिंह ठाकुर आज भी सिहर उठते हैं, उनका दिल दहल जाता है। उन्होंने बताया, मेरे शरीर से गोलियां तो निकल गईं, लेकिन पीठ में अभी भी धंसे उनके अवशेष हर पल वहां के दर्द को कुरेद रहे हैं।

मुझे याद है कि सुकमा से लौटते वक्त दोपहर 3:30 बजे थे, जब हम झीरम घाटी पहुंचे। गाड़ी में अचानक गोली लगने की आवाज आई। मेरे साथी ने बाहर झांककर देखा तो पहाड़ों में कई नक्सली बंदूक से हमला कर रहे थे। इस बीच मुझे और मेरे साथियों को गोली लग गई। कुछ दूर जाने पर नजरों के सामने धुआं छाया हुआ दिखा। कुछ देर में गोलियां और मारो-मारो की आवाज आने लगी। नक्सली कह रहे थे कि महेंद्र कर्मा को सरेंडर करिए। जैसे ही कर्मा सामने आए, नक्सली उन्हें ले गए। बंदूक थामे नक्सली गाड़ियों के पास आकर सभी को हाथ ऊपर करके बाहर निकलने को कहा। हमारी गाड़ी में महिला नक्सली पहुंचीं। जख्मी हालत में जब हम हाथ ऊपर कर नीचे आए तो वे हमें 500 फीट ऊपर पहाड़ी पर ले गए। इस दौरान करीब 60 नक्सलियों के बीच घिरे हमने बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी।

नक्सलियों ने कहा, सभी मारे जाओगे

नक्सलियों के बीच घिरे मौत के साए में जिंदगी की उम्मीद टूटती जा रही थी। बीच से एक नक्सली ने कहा, नंदकुमार पटेल कौन है बताओ, नहीं तो सभी मारे जाओगे। हमारे एक साथी ने हिम्मत दिखाई। नक्सली उन्हें 10 कदम दूर पड़े शव के पास ले जाकर उस व्यक्ति के बारे में पूछने लगे। तब उन्होंने नक्सलियों को बताया कि यह महेंद्र कर्मा हैं, नंदकुमार नहीं। यह सुनकर नक्सली अपने दूसरे गुट को इसकी जानकारी देकर चले गए।

दो कदम चलकर नीचे गिरे उदय भैया, उठे ही नहीं

नक्सलियों के जाने के बाद हम पहाड़ से पैदल चलकर जैसे-तैसे गाड़ी तक पहुंचे। देखा कि उदय भैया (उदय मुदलियार) गाड़ी में बैठे थे। मैंने कहा, भैया, बाहर आओ, चलते हैं। उन्हें गोली लगी थी। जैसे ही गाड़ी से नीचे उतरे, दो कदम चलकर गिर गए। फिर कभी उठे नहीं। विद्या भैया (पं. विद्याचरण शुक्ल) की गाड़ी के करीब जाकर उन्हें बाहर निकालने में मदद की। गोलियों से लहूलुहान विद्या भैया कराहते हुए पानी-पानी कह रहे थे। विचलित करने वाला वह दृश्य आज भी सोने नहीं देता है।

जब पता चला कि नहीं रहे नंदकुमार पटेल

नक्सलियों के जाने के बाद सभी घायलों को एंबुलेंस से भेजा जा रहा था, लेकिन हमें नंदकुमार भैया की चिंता थी। जानकारी मिली थी कि नक्सली उन्हें ले गए हैं। ऐसे में अनहोनी का अंदेशा पहले ही लग चुका था। सुबह अस्पताल में इस बात की जानकारी मिली कि वह भी हमारे बीच नहीं रहे। वह भयावह पल याद कर आज आत्मा कांप जाती है। न जाने कितनी रातें बिना सोए गुजरीं। अपनों को खोने का दर्द रह-रहकर सता रहा है। अब बस षड़यंत्रकारियों के चेहरे सामने आने और उन्हें सजा मिलने का इंतजार है।

Posted By: Abhishek Rai

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