रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

हम वीतरागी तीर्थंकर परमात्माओं की स्तुति कर ऐसी प्रार्थना करते हैं कि हे परमात्मा आप मुझ पर प्रसन्ना हों। यहां पर अज्ञानतावश यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जो परमात्मा वीतरागी हैं अर्थात जिन्हें न तो राग है और न ही द्वेष, ऐसे वीतरागी परमात्मा हम पर राग करके कैसे प्रसन्ना हो सकते हैं? इस पर ज्ञानी महापुरुषों ने समाधान करते बताया कि जिन्होंने सिद्धावस्था को, कैवल्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया ऐसे तीर्थंकर परमात्मा का नाम लेना ही अपने-आपमें पुण्यदायी है। यह संदेश साध्वी सम्यकदर्शना ने दिया।

जैन दादाबाड़ी में साध्वीश्री ने कहा कि जिस प्रकार शीत पीड़ा का कष्ट अग्नि के समीप जाने मात्र से दूर हो जाता है, वह अग्नि किसी भी मनुष्य या प्राणी में भेद नहीं करती। अग्नि यह नहीं कहती कि तुम मेरे समीप आओ, मनुष्य या प्राणी जो स्वयं अपनी इच्छा से उसके समीप जाते हैं, वह उनका शीत कष्ट बिना राग-द्वेष के मिटा देती है। चाहे वह व्यक्ति सज्जन हो या दुष्ट। वह उसके चरित्र के बारे में नहीं सोचती। फूल जैसे बिना राग-द्वेष के सबको सुगंध प्रदान करते हैं, वैसे ही अरिहंत-तीर्थंकर परमात्मा की कृपा हम पर उनके नाम लेने मात्र से स्वमेव हो जाती है। परमात्मा की कृपा हम पर उनकी प्रार्थना करने के हमारे सुकर्म से बरसती है। हम सभी यह संकल्प लें कि प्रभु परमात्मा की कृपा पाने के लिए हम उनकी भक्ति करें। लोगस्स सूत्र का स्मरण कर हम उनसे विश्वकल्याण की कामना करें।

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