रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

राज्य सरकार ने महापौर पद के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव की रूपरेखा करीब-करीब बना ली है। औपचारिकता पूरी करने के लिए कमेटी बनी है, जो जल्द रिपोर्ट सौंपेगी। यह तय है कि प्रदेश में पार्षद चुनाव लड़कर ही नेताजी महापौर पद पर आसीन हो सकते हैं। चुनाव के ठीक पहले सरकार के इस वार ने दिग्गजों को बैकफुट पर लगा दिया है। अरमानों पर मानो बज्रपात हो गया हो। नेता तो इतिहास भी खंगालने लगे हैं और यही डरा भी रहा है, क्योंकि कई बड़े दिग्गज नेताओं ने महापौर बनने की लालसा में पार्षद चुनाव लड़ा और हारे। उनमें भाजपा नेता तरुण चटर्जी, गौरीशंकर अग्रवाल के नाम शामिल हैं। सारे समीकरण मौजूदा दिग्गजों के पसीने छुड़ा रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक बीते सालभर से महापौर पद के लिए दावेदारी करने वाले, प्रदेश कार्यालय से लेकर दिल्ली दरबार तक में हाजिरी लगाने वाले अब चुनाव नहीं लड़ेंगे। भले पार्टी ही क्यों न चाहे। ऑफ द रिकॉर्ड यही सच है। क्योंकि हारे तो राजनीतिक भविष्य लगभग खत्म हो जाएगा।अगले पांच सालों के लिए करने के लिए कुछ नहीं होगा। 'नईदुनिया' से एक मजबूत दावेदार ने बातचीत में यह भी कहा कि जीते तो ठीक है लेकिन पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर पाई तो बैक बेंचर हो जाएंगे, अगर हारे तो शून्य पर पहुंच जाएंगे। इसलिए चुनाव न लड़ना ही इस मंदी में अकलमंदी है।

ये दिग्गज नेता थे, जो हारे थे चुनाव-

- 1994 में अप्रत्यक्ष चुनाव हुआ था। तब तरुण चटर्जी रायपुर ग्रामीण से भाजपा के विधायक थे, लेकिन महापौर बनने की इच्छा रखते हुए उन्होंने पार्षद चुनाव लड़ा। उनके विरुद्ध कांग्रेस ने उसी क्षेत्र के निवासी दीपक दुबे को टिकट दिया। दीपक ने 550 वोट से तरुण चटर्जी को मात दी।

- 1994 में ही वरिष्ठ भाजपा नेता गौरीशंकर अग्रवाल ने भी पार्षद चुनाव से महापौर बनने के लिए किस्मत आजमाई। उनके विरूद्ध कांग्रेस ने गजराज पगारिया को मैदान में उतारा। ले. अरविंद दीक्षित वार्ड के ही निवासी दोनों नेताओं में जबरदस्त टक्कर थी, लेकिन गौरीशंकर को हार का सामना करना पड़ा।

(जैसा की 'नईदुनिया' को भाजपा नेता लोकेश काबड़िया ने बताया...)

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निर्दलीयों का होगा बोल-वाला- जब-जब अप्रत्यक्ष चुनाव हुए हैं, तब तक निर्दलीय प्रत्याशियों का बोल-वाला रहा है। ये निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस बार भी समीकरण ऐसे ही बनते दिखाई दे रहे हैं। नेता जो टिकट हासिल नहीं कर पाएंगे, वे निर्दलीय मैदान में उतरेंगे। बहुमत हासिल करने के लिए ये महत्वपूर्ण कड़ी होंगे। राजनीतिक विशेषज्ञ तो यह भी मान रहे हैं कि ये 2019 में निगम की सत्ता की चॉबी होंगे।

खुल गया मौजूदा पार्षदों के लिए रास्ता- विधायक, पूर्व विधायक, महापौर, पूर्व महापौर और भाजपा व कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्षद का चुनाव नहीं लड़ेंगे। ये वे नेता हैं जो महापौर बनने की हसरत लिए बैठे थे। मगर सरकार के दावं ने इनकी हसरत पर पानी फेर दिया। जो कल तक दावेदारी कर रहे थे, सब पीछे हट गए हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network