रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

सिंधी समाज के लोग भादो कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि 23 अगस्त को 'थधड़ी' पर्व मनाएंगे। इस दिन सिंधी समाज के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलेगा और एक दिन पूर्व 22 अगस्त को घर-घर में विविध तरह के व्यंजन बनाए जाएंगे। अगले दिन 23 अगस्त को सुबह शीतला माता को भोग लगाया जाएगा और फिर परिवार के सभी सदस्य दिन भर ठंडा भोजन ही ग्रहण करेंगे।

सिंधी समाज के सदस्य प्रेमप्रकाश मंध्यानी और पं. अनूप शर्मा ने बताया कि 'थधड़ी' का मतलब ठंडा या शीतलता प्रदान करना होता है। इस दिन सिंधी समाज की महिलाएं सुख, शांति और आरोग्यता तथा शीतलता प्रदान करने वाली देवी शीतला माता की पूजा-अर्चना करती हैं। थधड़ी की पूर्व संध्या पर घर-घर में अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। खासकर आटे एवं बेसन की मीठी व नमकीन मोटी रोटी, धूली मूंग दाल की रोटी, पूड़ी, सब्जियों में करेला, भाटा, भिंडी, परवल, दही बड़ा, दही रायता, प्याज का रसदार अचार, मीठा आदि बनाया जाता है।

चूल्हे को पीली मिट्टी से लीपेंगे

भोजन बनाने के बाद चूल्हे को पीली मिट्टी से लीपकर एक कलश में जल भरकर चूल्हे की पूजा-अर्चना की जाती है। दूसरे दिन महिलाएं नहा-धोकर जल से भरा कलश और व्यंजन की थाल लेकर सरोवर, कुआं व शीतला मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करती हैं और साफ थाली में जल भरकर घर लाती हैं। इस जल को चूल्हे के अलावा पूरे घर में शीतला माता का जाप 'ठार माता ठार पंहिजें बचिणन खे ठार' का उच्चारण करती हैं। इसका अर्थ है कि हे मातारानी, आपने हमेशा अपने बच्चों पर कृपा बनाए रखी है, इसी तरह आगे भी कृपा व आशीर्वाद बनाए रखें। पूजा के पश्चात भोजन व मिठाई को बहनों के घर व धार्मिक स्थलों में भिजवाया जाता है।

परिवार पर होती है माता की कृपा

ऐसी मान्यता है कि थधड़ी के दिन चूल्हा ठंडा रखकर ठंडा भोजन किया जाए तो वर्ष भर सुख-शांति बनी रहती है, घर में कलह नहीं होता और लक्ष्मी का वास होता है। शीतला माता व अग्निदेव की असीम कृपा होती है।

Posted By: Nai Dunia News Network