रायपुर नईदुनिया प्रतिनिधि

मनुष्य खुशी को भौतिक पदार्थों में ढूंढ रहा है, किंतु भौतिक पदार्थों से स्थायी खुशी नहीं मिल सकती। राजयोग से ही जीवन में स्थायी खुशी प्राप्त की जा सकती है। राजयोग के लिए स्वयं की पहचान जरूरी है। यह सीख ब्रह्माकुमारी रश्मि ने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ऑनलाइन सात दिवसीय वेबिनार 'खुशियों की चाबी-राजयोग शिविर' में दी।

ऑनलाइन प्रशिक्षण में जुड़े लोगों से कहा कि यदि हम अपने जीवन को चिंता रहित बनाना चाहते हैं और सुख, शांति से रहना चाहते हैं तो यह जानना जरूरी है कि मैं कौन हूं? शरीर शांति नहीं चाहता। शरीर की शांति तो मृत्यु है। आत्मा कहती है कि मुझे शांति चाहिए। आत्मा का स्वरूप अति सूक्ष्म ज्योतिबिंदु के समान है। उसे न तो नष्ट कर सकते हैं और न ही पैदा कर सकते हैं। वह अविनाशी है। आत्मा के शरीर से निकल जाने पर न तो शरीर कोई इच्छा करता है और न ही किसी तरह का कोई प्रयास करता है। मृत शरीर के पास आंख, मुख, नाक आदि सब कुछ होता है, लेकिन वह न तो देख सकता है, न ही बोल अथवा सुन सकता है।

तीन शक्तियों से संचालित होती है आत्मा

आत्मा तीन शक्तियों के द्वारा अपना कार्य करती है। वह किसी भी कार्य को करने से पहले मन के द्वारा विचार करती है, फिर बुद्धि के द्वारा यह निर्णय करती है कि उसके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित? तत्पश्चात किसी भी कार्य की बार-बार पुनरावृत्ति करने पर वह उस आत्मा का संस्कार बन जाता है।

आत्मा की सात विशेषताएं

ज्ञान, सुख, शांति, आनंद, पवित्रता, प्रेम, और शक्ति आदि आत्मा की सात मूलभूत विशेषताएं हैं। यह सभी आत्मा के मौलिक गुण हैं, जो शांति की अवस्था में हमें अनुभव होते हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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