रायपुर। छत्तीसगढ़ में महापौर और निकायों के अध्यक्षों के चुनाव के नियम में बदलाव हो सकता है। महापौर और अध्यक्षों का चुनाव जनता नहीं, बल्कि पार्षद करेंगे, यह व्यवस्था लागू की जा सकती है।

इसका कारण यह है कि कांग्रेस के रायपुर-बिलासपुर के कार्यकर्ता और वर्तमान पार्षद इस पुरानी व्यवस्था को लागू करने की मांग कर चुके हैं। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश इस दिशा में कदम भी बढ़ा चुका है। मध्य प्रदेश में तो मंत्रिमंडल की उपसमिति ने ऐसी व्यवस्था को लागू करने की सिफारिश भी कर दी है। इससे छत्तीसढ़ के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पार्षदों की मांग और मुखर हो गई है।

राज्य के रायपुर नगर निगम में पहले यही नियम लागू थे। तब जनता पार्षद चुनती थी और पार्षद महापौर और निकाय अध्यक्ष। यह व्यवस्था 1984 तक चली। उस वक्त महापौर का कार्यकाल केवल एक वर्ष का होता था। 1985 से 10 वर्षों के लिए प्रशासक बिठा दिए गए। इस कारण इस बीच चुनाव नहीं हुआ। उसके बाद 1995 में जब फिर से चुनाव हुआ, तो जनता ने पार्षदों को चुना और पार्षदों ने महापौर का चुनाव किया था।

प्रदेश के बाकी नगरीय निकायों में यही नियम लागू रहा। इसके बाद नियम में बदलाव हुआ। 1999 से जनता ही सीधे पार्षदों के साथ महापौर और अध्यक्षों का भी चुनाव करने लगी। 2000, 2004, 2010 और 2015 का चुनाव ऐसे ही हुआ। अब पुरानी व्यवस्था को अपनाने की मांग फिर से उठी है।

यह मांग कांग्रेसियों ने की है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए कार्यकर्ताओं ही नहीं, पार्टी के वर्तमान पार्षदों को भी लग रहा है कि सरकार होने का फायदा मिलेगा। जनता ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस पार्षद चुनेगी, ताकि उनके वार्ड को लाभ हो। जब पार्षदों की संख्या अधिक होगी, तो महापौर और अध्यक्ष कांग्रेस के बनने का रास्ता आसान हो जाएगा।


सरकार को संशोधन का अधिकार

पूर्व निर्वाचन आयुक्त सुशील त्रिवेदी का कहना है कि स्थानीय चुनाव के नियमों में संशोधन का अधिकार राज्य सरकार को होता है। सरकार मंत्रिमंडल में संशोधन का प्रस्ताव लाकर नियम में बदलाव कर सकती है।