रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। छत्तीसगढ़ में भाजपा के कार्यकाल में साल 2018 में मनरेगा मजदूर टिफिन योजना की शुरू की गई थी, लेकिन बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार बन गई। इसके बाद से यह योजना अधर में है। करीब दो लाख टिफिन जिलों के सरकारी भवनों में कैद हैं। दरअसल तत्कालीन मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने 10 अगस्त, 2018 को राजधानी रायपुर के सरदार बलबीर सिंह जुनेजा इनडोर स्टेडियम में मनरेगा मजदूर टिफिन योजना का शुभारंभ किया था।

योजना के तहत करीब नौ लाख टिफिन खरीदे गए थे। साल चुनावी था और तारीखों की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लग गई। दावा किया जा रहा है कि उससे पहले मजदूरों को करीब सात लाख टिफिन बांट भी दिए गए, बाकी बचे दो लाख क्या हुआ? इसे लेकर अब कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने है। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर सियासत भी गरमा गई है।

सूबे में साल 2018 के आखिरी में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद टिफिन योजना अधर में लटकी हुई है। विभागीय अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जो टिफिन बट नहीं पाए थे, वे अलग-अलग जिलों के गोदामों में ठंप कर रखे है।इस संबंध में कोई भी दिशा-निर्देश नहीं आने के कारण मजदूरों को मुफ्त में बंटने वाले टिफिन पर लगा ताला नहीं खुल पाया,इसकी वजह से टिफिनों का वितरण नहीं किया जा सका है।मजदूर संगठनों का कहना है कि गोदामों में पड़े-पड़े टिफिन खराब हो जाएंगे, इससे पहले बांट दिए जाएं तो उनका भला होगा।

सियासी पेंच में उलझी योजना

नईदुनिया ने मुफ्ट टिफिन योजना की पड़ताल की तो पता चला कि अलग-अलग जिलों के सरकारी भवनों, दफ्तरों में ठंप कर रखे टिफिन पर पूर्व मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह की तस्वीर है। यही सियासी पेंच भी योजना के आड़े आ गया है। जानकारों का कहना है कि टिफिन योजना फिर से शुरू होने से भाजपा को लाभ मिल सकता।

लिहाजा टिफिन योजना शुरू करने से प्रत्यक्ष तौर पर मजदूर वर्ग का साथ भाजपा को मिलने का खतरा भी है। इस मुद्दे को लेकर भाजपा-कांग्रेस के अपने-अपने आरोप और तर्क हैं।भाजपा जहां कांग्रेस सरकार की मंशा पर सवाल उठा रही हैं, वहीं कांग्रेस ने मनरेगा की राशि रोके जाने का मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार और भाजपा को भी घेरा है। इन्हीं सब बातों को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासत चालू हो गई है।

लाखों का सरकारी पैसा बर्बाद

सूबे में कांग्रेस सरकार का तीन साल का हो चुका हैं, लेकिन अब तक टिफिन बांटे जाने के संकेत सरकार की तरफ से नहीं दिए गए हैं। लिहाजा विभागीय अफसर भी इस बारे में कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। अब सवाल यह उठने लगा है कि लाखों खर्च कर खरीदे गए टिफिन बाक्स पड़े-पड़े कबाड़ में तब्दील हो जाएंगे और जनता का पैसा पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा।

जशपुर जिले के कुनकुरी जनपद के सरकारी भवन में लाखों रुपये की लागत के हजारों टिफिन आज भी पड़े हैं। इसी तरह से राजनांदगांव के जनपद कार्यालय में ही करीब 16 सौ से ज्यादा टिफिन बाक्स गोदाम में रखे-रखे जंग खा रहे हैं। बलौदाबाजार जिले के लगभग हर ब्लाक में टिफिन को बंद कमरे में रखा गया है। ऐसे ही हालत कई और जिलों में हैं।

जंग खा रहा 38 हजार से अधिक टिफिन

राजनांदगांव संवाददाता ने बताया कि जिले में मनेरगा मजदूरों को स्टील टिफिन उपलब्ध कराने की योजना कागजों में चल रही है।मजदूरों का टिफिन पंचायतों के कक्ष में धूल खाते पड़ा है। कई टिफिन डब्बों में जंग लग गया है। साल 2018 में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने मनरेगा मजदूरों को टिफिन वितरण योजना शुरू की गई थी। योजना के तहत जिले के करीब 45 हजार मनरेगा मजदूरों को टिफिन का वितरण किया गया। कुछ माह बाद विस चुनाव के लिए आचार संहिता लग गया, जिसके चलते टिफिन का वितरण रोक दिया गया। फिर प्रदेश में सरकार बदल गई, लेकिन टिफिन को दोबारा वितरण शुरू नहीं हो पाया। जिले के जनपदों में करीब 38 हजार पांच सौ टिफिन धूल खाते पड़े हैं।

शासन को लिखा पत्र

बचे हुए टिफिन को मनरेगा मजदूरों को बांटने के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। प्रस्ताव आते ही टिफिन का वितरण शुरू किया जाएगा। -लोकेश चंद्राकर सीइओ, जिला पंचायत, राजनांदगांव

Posted By: Ravindra Thengdi

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