अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ में उत्पात मचाने वाले जंगली हाथियों को काबू में करने के लिए कर्नाटक से लाए गए हाथियों की पहली बार असल परीक्षा की घड़ी आ गई है। कर्नाटक के दुबारे और मतिगड़ा एलीफेंट कैंप से दो वर्ष पूर्व पांच कुमकी हाथियों को लाया गया था, जिसमें तीन को कोरबा और धरमजयगढ़ वनमंडल में उतारा गया है।

दरअसल इन दोनों क्षेत्रों में पिछले छह माह के भीतर छोटे कद के दंतैल हाथी गणेश का उत्पात चरम पर है। वह 12 लोगों की जान ले चुका है। गणेश को कब्जे में कर हाथी रेस्क्यू सेंटर में शिफ्ट करने के ऑपरेशन में कुमकी हाथियों को भी लगाया गया है।

कुमकी हाथियों को पिछले दो वर्षों से रखने में बड़ी रकम खर्च हो चुकी है लेकिन उनकी उपयोगिता अब तक साबित नहीं हो पाई है। अब पहली बार पता चल पाएगा कि उत्पाती हाथियों को कब्जे में करने के दावे के साथ कर्नाटक से लाए गए कुमकी हाथी वास्तव में दक्ष हैं या नहीं।


कुमकी हाथियों के साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के विशेषज्ञ, तमिलनाडु के ट्रैकर तथा स्थानीय वन अधिकारी, कर्मचारी ऑपरेशन गणेश में शामिल किए गए हैं । गणेश हाथी को ट्रेंकुलाइज करने के बाद वाहन में धक्का देकर सवार करने में कर्नाटक से लाए गए प्रशिक्षित हाथियों का उपयोग किया जाएगा। एक ओर जहां हाथी रेस्क्यू सेंटर में दंतैल गणेश हाथी को शिफ्ट करने की तैयारी है।


नही मिल पाता लोकेशन

दंतैल हाथी गणेश के आतंक से कोरबा और धर्मजयगढ़ वन मंडल के कई गांव थर्रा रहे हैं ।यहां हाथी लंबे समय से स्वच्छंद विचरण कर रहा है। दल के साथ नहीं होने के कारण इसकी मौजूदगी का सही प्रमाण भी नहीं मिलता ।उक्त हाथी पर सेटेलाइट कॉलर आइडी भी नहीं लगा है। इससे उसका लोकेशन भी नहीं मिल पाता।


व्यवहार में बदलाव कर बनाया कुमकी

कुमकी वह जंगली हाथी हैं जिन्हें कब्जे में कर हाथी कैंपों में रखकर उनके व्यवहार में बदलाव किया जाता है। इन हाथियों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है जो दूसरे उत्पाती जंगली हाथियों को कब्जे में करने में भी मदद कर सकते है। कैंपों में जन्म लेने वाले हाथी भी कुमकी बनकर ही निकलते हैं। अभी तक ये हाथी अपनी उपयोगिता छतीसगढ़ में साबित नही कर सके हैं।