रायपुर World Asteroid Day 2020 । सौरमंडल में मंगल और बृहस्पति के बीच में बहुत से ऐसे खगोलीय पिंड विचरण करते रहते हैं, जो अपने आकार में ग्रहों से छोटे और उल्का पिंडो से बड़े होते हैं। ये सौर प्रणाली के निर्माण के समय बने चट्टानी पिंड हैं, जिसे क्षुद्रग्रह कहा जाता है। क्षुद्रग्रह बड़े पैमाने पर सैकड़ों किलोमीटर विस्तृत क्षेत्र में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। यह कंकड़ के आकार से लेकर 600 मील की चौड़ाई तक का हो सकता है। क्षुद्रग्रह के टूटकर पृथ्वी पर गिरने से बड़ा नुकसान भी हो सकता है, हालांकि भारत में इसके गिरने के बहुत कम मामले देखने को मिले हैं।

पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री प्रो. नंद कुमार चक्रधारी बताते हैं कि यह स्वतंत्र पिंड है। सूर्य की परिक्रमा करते करते कभी भी रास्ते से भटक जाता है। वहीं अर्थ और सूर्य के फ्रिक्वेंसी की वजह से यह अलग से भी कभी दिखाई देने लगता है। उसके बाद फिर से सूर्य का चक्कर कर वापस निकल जाता है। यदि इसमें से कोई बहुत ज्यादा आकर्षित होकर पृथ्वी पर गिरकर बचता है तो वह उल्का पिंड कहलाता है। वहीं जो पिंड ऊपर ही जल जाता है उसे उल्कापात्र कहते हैं। यह प्रक्रिया चलते रहती है, लेकिन पृथ्वी पर गिरने की घटना बहुत कम होती है।

पृथ्वी पर गिरने से हो सकता है नुकसान

प्रो. नंद कुमार चक्रधारी बताते हैं कि पृथ्वी पर उल्का पिंड के गिरने से काफी नुकसान हो सकता है। इसके गिरने की गति काफी तेज होती है, जिस जगह पर यह गिरती है वहां बड़ा गड्डा होने के साथ आसपास के इलाके को प्रभावित करती है और मानव जीवन को भी नुकसान पहुंचा सकती है। चांद पर गड्डों के जो निशान पाए गए हैं वह उल्का पिंड के गिरने की वजह से है, जबकि पृथ्वी पर गिरने के इसके चांस कम है, क्योंकि हवा की वजह से यह पृथ्वी तक नहीं गिर पाता।

Posted By: Nai Dunia News Network

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